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अब मोदी के नाम से हिलोर नहीं उठती - Khabar NonStop

modiशंभूनाथ शुक्ल

अभी हाल में पांच सीटों पर हुए उपचुनाव और गुजरात एवं हिमाचल विधानसभा चुनावों के नतीजों से भले हम मान लें कि अभी भाजपा जीत की तरफ ही अग्रसर है, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि उसकी गति अब ढीली पड़ने लगी है। मोदी के सारे ब्रह्मास्त्र अब फुस्स होने लगे हैं। प्रधानमंत्री अपने ही दुर्ग में ऐसे उलझ गए हैं कि गुजरात में उनके समक्ष राहुल गाँधी को इस तरह खड़ा कर दिया है कि जरा भी लचक उन्हें ले डूबेगी। क्या यह आश्चर्य कि भाजपा अधिकांश सीटों पर उतने ही वोटों से जीती, जितने वोट नोटा को मिले या कहीं-कहीं बसपा अथवा आप को।

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इसके बाद टू-जी के कथित घोटाले पर कोर्ट का जो फैसला आया है, उससे भी मोदी सरकार की दबंग छवि बुरी तरह बिखरी है। अभी कल तक जो लोग मोदी को दिग्विजयी मान रहे थे,उनका भी कहना है कि अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तो मोदी को 2019 भारी पड़ जाएगा। अब बस मोदी के लिए अनुकूल बात यह है कि कांग्रेस में नेता इतने ढीठ और चापलूस बन गए हैं कि वे अपने अध्यक्ष को सही-गलत तो बताने से रहे। वे राहुल को कभी द्वारिकाधीश ले जाएंगे तो कभी सोमनाथ, लेकिन यह प्रयास वे नहीं करेंगे कि कैसे उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा को साथ मिला लिया जाए और पश्चिम बंगाल में तृणमूल तथा तमिलनाडु में द्रमुक को अपनी तरफ लाया जाए। वाम दलों को भी। असल बात तो यह है की कांग्रेस में विवेकसम्मत बात करने वाले बौद्धिक वर्ग कमजोर पड़ा है। और अनुभवी नेता तड़ीपार कर दी गए हैं। ऐसे में और होगा क्या! भावनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और समाज विज्ञान केंद्र, सूरत के निदेशक रहे डाक्टर विद्युत जोशी ने अभी हाल में अपने एक सामाजिक शोध में बताया है कि मोदी की जीत का मात्र एक तिहाई हिस्सा हिन्दुत्त्व का रहा था, लेकिन कांग्रेस ने उसे ही हिंदू धर्म समझ लिया। डाक्टर विद्युत जोशी ने ही सबसे पहले घोषणा की थी कि गुजरात में भाजपा सरकार तो बचा लेगी लेकिन रहेगी 100 के नीचे ही। उन्होंने कांग्रेस को 80 से 85 के बीच अटक जाने की भविष्यवाणी की थी। डाक्टर जोशी ने कहा है कि गुजरात के सोमनाथ से लालकृष्ण आडवाणी ने जब 1990 में अयोध्या  तककी रथयात्रा शुरू की थी, तब हिन्दुत्त्व की लहर उठी थी, इस लहर को गोधरा से और आग मिली तथा 2002 उसका चरम था। मालूम हो कि 2002 में भाजपा को गुजरात में 127 सीटें मिली थीं। इसके बाद मोदी ने 2007 का चुनाव सद्भावना के नाम पर लड़ा और 2012 विकास के नाम पर।

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इसका सीधा अर्थ है कि 2014 का लोकसभा चुनाव विकास, सद्भावना और हिन्दुत्त्व के नाम पर लड़ा गया। और इन सबका मोदी को आशातीत लाभ मिला। लेकिन तीन साल के भीतर ही पहले की मोदी लहर लौटने लगी। डाक्टर जोशी की नज़र में इसका सबसे बड़ा कारण मोदी सरकार का अपने वायदों, खासकर किसानों को किए गए वायदे, पर खरा न उतरना है। इससे मोदी की छवि किसानों के बीच एक झूठ बोलने वाले राजनेता की बन गई है। यही कारण है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद शहरी इलाकों में भाजपा को भारी सफलता मिली जबकि देहातों में कांग्रेस को। उनके मुताबिक हिन्दुत्त्व का अब कोई असर नहीं रह गया है, इसीलिए मुसलमानों के वोहरा और खोजा जैसे व्यापारी समुदाय की पहली पसंद भाजपा रही। मगर कांग्रेस नेतृत्त्व की अनुभव शून्यता के चलते डाक्टर जोशी का कहना है कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि 2019 में कांग्रेस कोई करिश्मा कर पाएगी। अलबत्ता उनका कहना है कि 2024 तक मोदी के तरकश के सारे तीर स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे।

 



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