जन्मदिन स्पेशल: समाजसेवी बाबा आमटे के बारे में जानें कुछ तथ्य - Khabar NonStop
बाबा आमटे का जन्म 26 दिसंबर, 1914 उनका पूरा नाम मुरलीधर देवदास आमटे था। उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। बचपन से ही समाज सेवा एवं देश सेवा का भाव उनके मन में कूट-कूटकर भरा था।
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कार्य
बाबा आमटे का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए आनन्दवन नामक संस्था की स्थापना का था।
जब वे 35 वर्ष के थे, तब उन्होंने उसकी स्थापना की थी। आज वह एक विशाल रूप धारण कर चुकी है।
-आनन्दवन के साथ ही उन्होंने एक अन्ध विद्यालय की स्थापना भी की। गरीब, बेसहारा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु उन्होंने गोकुल नामक संस्थान का गठन व संचालन किया।
-जब पंजाब में आतंकवाद का साया मण्डरा रहा था, कुछ गुमराह नवयुवक भारत की अखण्डता को तोड़ने में लगे थे।
गांवों और शहरों में निहत्थे, निर्दोष नागरिकों की हत्याएं कर रहे थे, जहां बच्चे, बूढ़े और विधवा महिलाएं आसू भरे दिन गुजार रहे थे।
भटके हुए पंजाबी नवयुवक पाकिस्तान जैसे शत्रु के साथ मिलकर न केवल आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे थे।
पंजाब को खालिस्तान बनाने में लगे हुए थे, आतंकवाद के साये तले निर्दोष नागरिकों की हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था।
देश को कुछ गुमराह लोग तोड़ने में लगे हैं, ऐसे ही समय में 72 वर्ष की अवस्था में पंजाब जाकर वहां से भारत जोड़ो आन्दोलन का सूत्रपात किया।
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भारत जोड़ो आन्दोलन
जालन्धर, लुधियाना, कपूरथला, बटाला, नकोदर आदि स्थानों पर जाकर आतंकवाद से पीड़ित लोगों के औसू पोंछे, साथ ही 24 दिसम्बर 1985 को कन्याकुमारी से आरम्भ किये हुए इस भारत जोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में 5,000 कि०मी० तक की पदयात्रा की। राष्ट्रीय एकता एवं भावात्मक जागरण का सन्देश देने हेतु प्रत्येक राज्य से 4-4 युवक और युवतियों को लेकर इस अभियान में जुट पड़े और भारत की एकता, अखण्डता को मजबूती से जोड़ने में संलग्न हो गये। उनकी इस यात्रा का ”भारत अमर रहे। सारा देश एक हो।” का प्रेरणादायक नारा उसका संबल था। राष्ट्रद्रोहियों और समाजद्रोहियों के लिए उनका यह संकल्प भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए अत्यन्त आवश्यक था।
10 फरवरी 2008 को हुआ देहावसान
इस आन्दोलन के दौरान उनकी रीढ़ की हड्डी टूटने पर भी 72 वर्षीय बाबा आमटे ने पूर्व जैसा जोश बनाये रखा। उनकी पत्नी साधना आमटे सदा उनके सेवा कार्यों में साथ रहीं। रोगियों के उपचार हेतु बाबा ने मुफ्त दवाइयां बांटीं। नर्मदा घाटी, सरदार सरोवर बांध निर्माण के फलस्वरूप हजारों विस्थापित बेघर आदिवासियों को उन्होंने नयी आशा की किरण दिखाकर सहारा दिया। 10 फरवरी 2008 में उनका देहावसान हो गया।
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