डर कर जीने में ही जीत होती है! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
डर के आगे जीत का प्रचार भले किया जाए पर वास्तविक दुनिया का सत्य यह है कि डर के चलते ही जीत होती है। इसे यूं कहना चाहिए कि जो डरता है वही जीतता है। डर के आगे जाने का मतलब जीवन को अराजक बना देना होता है। अगर मनुष्य डर अपने दिल से निकाल देगा तो हर चीज के प्रति अवहेलना जन्म लेती है। यह अवहेलना न सिर्फ मानसिक भय की वरन कानून के प्रति भी होने लगती है और निर्भय होने का उसका दावा व्यक्ति को हर सामाजिक बंधन से आजाद कर देता है। सत्य यह है कि जिस समाज में हम रहते हैं उसके प्रति दायित्वों के निर्वाह के लिए हमें उसके कानून-कायदे व नैतिक मर्यादाओं का ध्यान रखना ही पड़ता है। विभीषण लंका नरेश रावण के दरबार में रहते थे पर डर-डर कर ही और इसी का नतीजा था वे कई मामलों में लंका नरेश को समझाने की कोशिश भी करते थे। हनुमान जी जब लंका गए तो एक घर पर उन्होंने देखा कि वहां पर हवन हो रहा है और एक सज्जन पुरुष सौम्य मुद्रा में वहां बिराजे हैं। हनुमान जी उस घर में घुसे और उन सौम्य-सी मुद्रा वाले सज्जन से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने बताया कि वे लंका नरेश रावण के छोटे भाई हैं पर यहां पर अराजक राक्षसों के बीच वे इस तरह रहा करते हैं जैसे दांतों के बीच बेचारी जीभ। संत कवि तुलसीदास ने विभीषण के इस वर्णन का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। विभीषण हनुमान जी को बताते हैं- “सुनहु पवनसुत रहन हमारी, जिमि दसनन मा जीभ बिचारी”। अर्थात हे पवन सुत मेरा निवास तो यहां उसी तरह जैसे दांतों के बीच बेचारी जीभ रहती है।
रिटायरमेंट जिंदगी की दूसरी पारी है
निडर होना अच्छी बात है पर निडर किस संदर्भ में अगर मानसिक संताप से गुजरने के लिए निडर और निर्भय बनना पड़े तब तो ठीक है पर आजकल जिस तरह से युवा अपनी जान जोखिम में डालकर सेल्फी लेते हैं उसे कहां तक उचित बताया जाए। अभी पिछले दिनों रीवा के एक प्रपात मे सेल्फी लेने के चक्कर में एक-एक कर पांच लड़के बह गए। वे उस प्रपात की धार में अपनी फोटो खींच रहे थे। रीवा का चचाई प्रपात तो आम दिनों में ही खतरनाक होता है फिर जिस तरह से एमपी में भारी बारिश हुई है उसमें ऐसा जोखिम लेने का मतलब जान से खेलना अथवा मृत्यु को दावत देना है। और ऐसा सिर्फ रीवा में ही नहीं हुआ। कुछ दिनों पहले गाजियाबाद के पास चलती ट्रेन में सेल्फी लेने के चक्कर में एक युवती अपनी जान गँवा बैठी थी। पटरियों पर चलते हुए कान में माइक्रोफोन लगाकर गाने सुनना आम हो गया है और इसके चलते कई किशोर अपनी जान दे चुके हैं। अभी हाल ही मेें एक सर्वे से पता चला है कि दिल्ली में लूट की अधिकतर घटनाएं तब हुईं जब लूटे जाने वाला युवक मोबाइल से चिपका हुआ था और वह लुटेरे से अनजान बना रहा। सड़कों पर दुर्घटनाओं का औसत इधर बढ़ा है और रोड रेज की घटनाएं भी। इसकी वजह यही मोबाइल है कि गाड़ी चलाते समय गाड़ी मालिक अपने मोबाइल पर बतिया रहे थे और सामने से आने वाला वाहन उन्हें दिखा ही नहीं। इसी तरह रोड रेज की वजह भी यही है। गाड़ी चलाते समय जाम का अवरोध आदमी को असहनशील लगने लगती है और वह झगड़े पर उतर आता है। यह असहनशीलता तब ही आती है जब आदमी व्यावहारिक दुनिया से कट जाता है और उसका अधिकांश समय आन लाइन ही बीतता है।
तुलसी विपदा के सखा धीरज, धर्म, विवेक!
सोशल मीडिया के चक्कर में आकर व्यक्ति व्यावहारिक दुनिया से कट जाता है और अपने लिए अपनी बात रखने का अकेला माध्यम सोशल मीडिया को मान लेता है। चूंकि सोशल मीडिया पर अंकुश नहीं है इसलिए वह जो कुछ चाहता है लिख देता है। यह अक्सर भड़काऊ और असामाजिक होता है। इसका नतीजा यह होता है कि वह व्यावहारिक दुनिया को भी सोशल मीडिया का ही एक मंच समझने लगता है और वहां भी अक्सर वह ऐसा व्यवहार करता है जो समाज के मान्य सिद्घांतों और नैतिकताओं के प्रतिकूल हो। यह इसी डर के निकल जाने का नतीजा है। डर को मन से निकालने का मतलब जानबूझ कर जोखिम मोल लेना नहीं है अथवा यह भी नहीं है कि हम समाज की नैतिकता और उसके मापदंडों को भूल जाएं या उनकी अवहेलना करने लगें। क्योंकि उसकी यही अवहेलना उसे अपनी जान को खतरे में डालने वाली होती है और साथ ही अपने निर्भय और निडर होते मन को वह दुस्साहसी बना देता है जिसका फल होता है अपना विनाश और समाज का पतनोन्मुखी होते जाना।
आजकल महानगरों खासकर उत्तर भारत के महानगरों में जान जोखिम में डालकर सड़कों पर मोटर साइकिल पर स्टंट करने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यह इसी डर के आगे जीत है का ही नतीजा है। मगर अगर इसी डर को वैज्ञानिक तरीके से जीतने का प्रयास किया जाए तो शायद नतीजे भी बेहतर होंगे। आजकल दिल्ली, हरयाणा, पंजाब और चंडीगढ़ से मोटरसाइकिलों के जरिये लेह-लद्दाख जाने का चलन बढ़ा है और इनमें से कुछ उत्साही युवा तो हिमाचल के दुर्गम रास्ते से लेह पहुंचते हैं। जहां पर कई सौ किमी का पैच तो ऐसा है कि अगर किसी कारणवश वहां रुक जाना पड़े तो मीलों तक कोई इंसान नहीं मिलता पर लोग जाते हैं। मय साजो सामान के और सकुशल लौटते हैं। मगर इस दुर्गम यात्रा के पीछे सोची-समझी रणनीति होती है। उनकी मोटर साइकिलें हर तरह से सुरक्षित बनाई जाती हैं और उनकी कीमत भी कई-कई लाख तक तक होती हैं। अच्छी किस्म की मोटरसाइकिल लेकर जो हिमालय पार करते हुए लेह व लद्दाख जाते हैं। वे पूरी तैयारी के साथ होते हैं। उनके पास कहीं भी रुकने के लिए जरूरी साजो-सामान से लेकर अतिरिक्त पेट्रोल व अन्य सहायक सामान रहते हैं। फिर वे समूह में चलते हैं और जहां कहीं भी बर्फ को गिरते देखा तो वे जोखिम लेते हुए आगे नहीं बढ़ते जाते वरन् वहीं रुक जाते हैं। वे जोखिम भरे रास्ते में सेल्फी नहीं लेते और न ही अपना धीरज खोते हैं। इसका साफ संकेत है कि अगर जोखिम को पार करना है तो डर को निकालना होगा पर अपना विवेक नहीं। जब आदमी विवेक खो देता है तब ही वह समाज की अवहेलना, कानून की अवहेलना और जोखिम में जान डाल देना जैसी हरकतें करने लगता है।
कोहरे से थम क्यों जाते हैं पहिये!
इसलिए डर के आगे जीत है पर यह जीत तब ही सफल होती है जब आदमी विवेक न खोए। जिस दिन आदमी विवेक खो देगा उस दिन उसका यह निडर रहने का प्रयास उसे एक ऐसी खाई की तरफ ले जाएगा जहां पर सिर्फ गिरा जा सकता है उससे निकला नहीं जा सकता। मनुष्य के लिए निडर रहने का अर्थ यह है कि वह पूरी सोच के साथ भय का मुकाबला करे। जब यह ऐसा करेगा तब उसके जोखिम का मतलब सत्य को जानना होगा न कि सत्य के साथ खिलवाड़। इसलिए जोखिम पूरा करने के लिए डर तो भगाइए मगर दुस्साहसी मत बनें।
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