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जानिए, इस्लाम धर्म में ब्याज लेने पर क्यों है मनाही ?

इंटरनेट डेस्क। जैसा की यह तो हम भी जानते हैं हिन्दु और मुसलमानों के नियम और कायदे कानून अलग अलग होते है। आपने मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखनेवाले लोगों के मुंह से ये सुना ही होगा कि उनके धर्म में ब्याज लेने को हराम माना जाता है।अर्थशास्त्र और गणित की भाषा में भले ही ब्याज को मूलधन का किराया या शुल्क माना जाता है लेकिन इस्लाम में इसे अनुचित माना गया है।

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मुस्लिम धर्म में ब्याज लेना है हराम:
इस्लाम धर्म के अनुसार ब्याज एक ऐसी व्यवस्था है जो अमीर को ज्यादा अमीर और गरीब को ज्यादा गरीब बनाती है। इसलिए मुस्लिम धर्म में ब्याज लेना गरीबों के शोषण का एक जरिया माना जाता है।

इस्लाम धर्म के पवित्र धार्मिक ग्रंथ कुरान में स्पष्ट रुप से ब्याज को वर्जित माना गया है। इस्लाम में कहा गया है कि ऐ ईमानवालों दो गुना और चार गुना करके ब्याज मत खाया करो और अल्लाह से डरो।

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इस्लाम धर्म के अनुसार ब्याज खाने वालों के घर से बरकत खत्म हो जाती है। कहा जाता है कि मोहम्मद साहब के दिव्य संदेश से पहले अरब निवासियों में ब्याज की प्रथा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी।

जो लोग ब्याज हांसिल करने का निश्चय कर चुके हैं और उसके लिए बहाने बनाते हैं तो यह एक शैतानी धोखा है। जो लोग ब्याज खाते हैं उनके बारे में कहा गया है कि वे कयामत के दिन खड़े नहीं हो सकेंगे।

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