आखिर हिन्दु ही क्यों पहनते हैं जनेऊ ? जानिए चौंकाने वाला कारण….
इंटरनेट डेस्क। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जिसे हिंदू धर्म में यज्ञोपवीत नाम से जाना जाता है। इसे पुरुष बाएं कंधे के ऊपर से दाई भुजा के नीचे की ओर पहनते है। हिंदू धर्म में पहले के समय की बात करें तो शिक्षा ग्रहण करने से पहले यज्ञोपवीत होता था। उसके पश्चात ही शिक्षा दी जाती थी, लेकिन आज के समय में 10 -12 साल की उम्र के लड़के की जनेऊ पहना दी जाती है। यज्ञोपवीत को उपनयन संस्कार नाम से भी जाना जाता है। उपनयन संस्कार होने से पहले उस लड़के को गायत्री मंत्र सिखाया जाता है जोकि उसके पिता द्वारा संपन्न किया जाता है। जानिए पुरुष जनेऊ क्यों धारण करते है। इसके पीछे का कारण क्या है।
जनेऊ धारण करना
जनेऊ धारण करने की भी अपनी एक विधि है। इसके अनुसार जो व्यक्ति अविवाहित होगा उसे तीन धागों वाला जनेऊ और विवाहित व्यक्ति को दो धागें वाला जनेऊ पहनाया जाता है। और अगर किसी विवाहित व्यक्ति के बच्चे है तो उसे भी तीन धागों वाला जनेऊ पहनाया जाता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह तीन धागे मनुष्य के तीन ऋण माने जाते है। जो निम्न है-
माता-पिता और पूर्वजों का ऋण
इसके अलावा हिंदू धर्म में अनुसार जनेऊ के तीनों धागों में तीन देवियां क्रमश: पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती विराजमान है। जोकि आपके जीवन को सफल बनाने के लिए काफी है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि इसे धारण करने से मनुष्य के विचार, शब्द, कामों में निर्मलता आ जाती है। साथ ही यह ब्रह्मचारी जीवन का नेतृत्व भी करता है। साथ ही यह किसी बालक के शिक्षा से भी संबंध रखता है।
शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।
जनेऊ को ‘उपनयन संस्कार’ (यज्ञोपवीत संस्कार) के समय धारण किया जाता है। संस्कृत भाषा में जनेऊ को ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहना जाता है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले बालक द्विज का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था, जिसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त हुआ था। साधारण भाषा में जनेऊ एक ऐसी परंपरा है, जिसके बाद ही एक बच्चे को मर्द का स्थान दिया जाता है और वह पारंपरिक तौर से पूजा आदि में भाग ले सकता है।
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