सेक्स सीडी से किसे क्या मिलेगा! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
हार्दिक पटेल की सेक्स सीडी से किसी का कोई भला नहीं होने वाला तब गुजरात विधानसभा चुनाव के कुछ पूर्व इस सीडी का भला किसे क्या लाभ मिलेगा! गुजरात में हार्दिक पटेल एक न्यूसेंस से अधिक नहीं हैं। सीडी कांड के बाद उनका जो बयान आया है वह और भी शर्मनाक है। उन्होंने कहा है, मर्द हूँ, नपुंसक नहीं। इस तरह के बयान से वे अपनी मर्दानगी का प्रचार तो कर सकते हैं लेकिन पिछले वर्षों में उन्होंने पटेलों (पाटीदारों) को एकजुट करने का जो अभियान चलाया था वह फुस्स होता नज़र आ रहा है। हार्दिक को ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने कोई शहरी लौडों को जोड़ने का अभियान नहीं चलाया था बल्कि किसान समाज को एकजुट करने की शुरुआत की थी, उनके इस तरह के बयानों से किसानों में गलत संदेश गया है। ऊपर से कांग्रेस के नेता हार्दिक के पक्ष में सोशल मीडिया पर जिस तरह का अभियान छेड़े हैं उससे भी वे हार्दिक पटेल को मुख्यधारा की राजनीति से बाहर कर रहे हैं।
हालाँकि, गुजरात का चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए अहम है। बीजेपी यदि विधानसभा में अपनी मौजूदा संख्या 115 से एक सीट भी कम लाती है तो उसकी भारी किरकिरी होगी और कांग्रेस अगर 61 से ज्यादा लाती है तो उसकी जय-जय होनी तय है। तब ऐसे में इस सीडी से किसी को कुछ नहीं मिलने वाला। वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि, गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव के नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी तय करेंगे। ये दोनों चुनाव बीजेपी जीतती है तो 2019 जीतना आसान ही नहीं लगभग पक्का है और अगर कोई डेंट लगता है तो भाजपा के दुर्दिन शुरू हो जाएंगे। ये विधानसभा चुनाव राहुल गाँधी की नेतृत्त्व क्षमता पर मुहर भी लगाएंगे और उनके विरुद्ध पप्पू की जो छवि जनता के बीच बनाई गई है, वह धुल जाएगा। इस तरह ये चुनाव दोनों ही मुख्य दलों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इनका चुनाव कितना अहम है, इसका अंदाज़ इसी से होता है कि इन दोनों विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा के लिए तीन सप्ताह का अंतर दिया गया। जब नतीजे एक साथ ही आने हैं तो घोषणाएं अलग-अलग क्यों।
अभी हिमाचल में कांग्रेस और गुजरात में भाजपा की सरकारें हैं। हिमाचल में आमतौर पर एक बार कांग्रेस तो एक बार भाजपा की सरकार रहती आई है जबकि गुजरात में पिछले 22 साल से भाजपा की ही सरकार है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन बार गुजरात सरकार के मुखिया रहे हैं, वह भी लगातार लेकिन पिछले तीन साल में वहां तीन मुख्यमंत्री बदले। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बन गए तो पहले तो आनंदीबाई पटेल को वहां का मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन हार्दिक पटेल की अगुआई में पाटीदारों का जो बड़ा आन्दोलन हुआ और जिस तरह सरकार की किरकिरी हुई, उसके बाद उन्हें हटाकर अमित शाह के करीबी विजय रूपानी को कमान दी गई। लेकिन विजय रूपानी के नेतृत्त्व में गुजरात कोई बहुत तरक्की नहीं कर सका न ही वहां का व्यापारी खुश रहा। लेकिन गुजरती अस्मिता के नाम पर गुजरात के मन में प्रधानमंत्री के प्रति एक आदरभाव है। मगर कितना, यह पता तो 20 दिसम्बर को ही चलेगा।
हिमाचल और गुजरात कोई बड़ी विधानसभाएँ नहीं हैं। हिमाचल में कुल 68 सदस्य हैं और गुजरात में 182, मगर इसके लिए जैसा हौवा खड़ा किया गया, वह अवश्य चौकाने वाला है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने गुजरात में महीने भर पहले से ही डेरा डाल लिया था तो भाजपा चुनाव की तारीखें घोषित होने के पहले शंकरसिंह बाघेला को ले आई और कांग्रेस ने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश को अपने पाले में ले आई। अर्थात कुल मिलाकर अति विकसित राज्य गुजरात में भी चुनाव जातीय समीकरणों और मज़हबी ध्रुवीकरण पर लड़ा जाएगा। हालाँकि। गुजरात में मुस्लिम आबादी कुल 9 प्रतिशत ही है लेकिन 35 सीटों को वे प्रभावित करते हैं। गुजरात में कभी माधवसिंह सोलंकी ने खाम (KHAM) बनाया था। यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी व दलित। मालूम हो कि गुजरात में क्षत्रिय पिछड़ों में आते हैं, इस समीकरण के बल पर गुजरात में कांग्रेस ने कई वर्षों तक राज किया था। वहां अगड़ी जातियों में सिर्फ पटेल, शाह और ब्राह्मण ही हैं। भाजपा ने जब केशुभाई पटेल की जगह उनके शिष्य नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया तब उसका मकसद इसी खाम के चक्र को ही तोड़ना था। नरेंद्र मोदी चूँकि पिछड़ी जाति से हैं इसलिए उन्होंने बस इस खाम से ‘म’ हटा दिया और बाकी ‘खा’ को उदरस्थ कर गए। नतीजा यह हुआ कि मोदी तीन टर्म लगातार मुख्यमंत्री रहे।
मोदी के हटने के बाद आनंदीबेन पटेल इस समीकरण को बनाए नहीं रख सकीं। इसकी दो वज़हें रहीं, एक तो आनंदीबेन पटेल तो थीं लेकिन पाटीदार नहीं इसलिए हार्दिक पटेल के आन्दोलन को वे ठीक से सुलझा नहीं पाईं। दूसरे वे मोदी की तरह गुजरात को बेहतर तरीके से समझ नहीं सकीं। यही समस्या विजय रूपानी के साथ भी है, वो जैन समुदाय से इसलिए गुजरात की बहुसंख्यक पिछड़ी आबादी के साथ सम्बन्ध बेहतर रखना उनके लिए भी आसान नहीं रहा। मालूम हो गुजरात में 24 प्रतिशत कोली, 18.5 प्रतिशत पाटीदार, 17.5 परसेंट आदिवासी और 7-7 प्रतिशत क्रमशः दलित और मुस्लिम हैं। जबकि ब्राह्मण 9 प्रतिशत ब्राह्मण तथा एनी पटेल आदि हैं। अभी गुजरात विधानसभा में इस समय भाजपा के 115 सदस्य हैं, 61 कांग्रेस के पास हैं बाकी की छह निर्दलीयों के पास हैं। अब इस 182 सदस्यीय विधानसभा का चुनाव दो चरणों में होगा। पहले चरण का मतदान 11 दिसम्बर को और दूसरे चरण की वोटिंग 16 दिसम्बर को होगी।
हिमाचल विधानसभा में 68 सीटें हैं, इनमें से 36 कांग्रेस के पास हैं और 26 भाजपा के पास, बाकी अन्य को मिली थीं। वहां मतदान 9 नवम्बर को हो चुका है और रिजल्ट 20 दिसम्बर को ही घोषित किया जाएगा। ये दोनों ही चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए बहुत अहम हैं, खासकर गुजरात। हालाँकि, निष्पक्ष प्रेक्षक मानते हैं कि अभी गुजरात में भाजपा बहुत कमजोर नहीं हुई है, इसकी वज़ह भावनाओं का प्रवाह है। चूँकि एक गुजराती देश का प्रधानमंत्री है इसलिए गुजरातियों के अंदर एक गौरव भाव है, लेकिन पहले तो नोटबंदी और फिर जीएसटी ने जिस तरह से गुजराती व्यापारियों की कमर तोड़ी है इससे वे आहत तो हैं। अब सारा दारोमदार इसी पर है कि भावना का प्रवाह तेज होता है या आर्थिक हालात के दुष्परिणाम अपना असर डालता है।
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