भंसाली की कमाई ने हिंदू-मुस्लिम खाई बढ़ाई! - Khabar NonStop
संजय लीला भंसाली हर चीज को बेचना जानते हैं। उन्हें पता है कि किस समय क्या बेचा जाए। आखिर वे सौदागर जो ठहरे। अब फिल्मों के जरिए कोई बेहतर सन्देश देने की परम्परा ख़त्म हो गई है। अब तो फिल्मों से हर वह चीज़ बेची जाने लगी है जिसके बिकने से पैसा आए। आज हिंदू-मुस्लिम एक ऐसा विषय है जो खूब बिक सकता है। संजय लीला भंसाली ने इस विवाद के जारी पैसा कमाने की ठानी है। इसके लिए वे इतिहास में जाते हैं और फिर उसमें से बिकाऊ चीज तलाशते हैं। जोधा-अकबर, बाजीराव मस्तानी में यही सब कर अब वे पद्मिनी विवाद को हवा दे रहे हैं। चित्तौड़ की रानी एक ऐसा कैरेक्टर है जो कट्टर हिंदुओं को रानी के जौहर से उत्तेजित कर देता है और सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी को खलनायक बना देता है। वहीँ कट्टर मुसलमानों को लगता है कि उनका नायक तो अलाउद्दीन खिलज़ी ही है तथा सुंदर स्त्री के लिए हर तरह के जतन करने चाहिए। भले ही वह किसी की ब्याहता क्यों न हो।
सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी तो एक ऐतिहासिक कैरेक्टर है पर रानी पद्मिनी का कोई लेखा-जोखा नहीं मिलता। सिवाय किंवदंतियों के उनके सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं मिलता। अलबत्ता प्रसिद्ध सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने उन पूरा एक महाकाव्य पद्मावती नाम से लिखा है। मज़े की बात कि जायसी खिलज़ी सुल्तान के 200 साल बाद पैदा हुए। और दिल्ली दरबार में उनकी कोई पैठ नहीं थी। चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलज़ी ने चढ़ाई जरूर की थी और तब अमीर खुसरो खिलज़ी के साथ रणक्षेत्र में गए थे। उसने किसी भी रानी पद्मिनी अथवा खिलज़ी सुल्तान के किसी रानी पर मोहित होने का सन्दर्भ नहीं दिया है। इसीलिए इस पूरी गाथा को इतिहासकार सही नहीं मानते। यह जरूर है कि हिंदू सौन्दर्य शास्त्र और नायिका-भेद में पद्मिनी एक ऐसी आदर्श सुंदरी नायिका है, जो अपनी सुन्दरता से अप्रितम तो है ही लाज, शील और संकोच से भी। इसलिए हर तरह से उत्तम स्त्री पद्मिनी ही है। अब इस बहाने यह पद्मिनी नाम का चरित्र गढ़ा गया हो तो अलग बात है।
किंवदंती यह है कि समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठा था। रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलज़ी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने चित्तौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी। उसने चित्तौड़ के क़िले को कई महीनों घेरे रखा पर चित्तौड़ की रक्षार्थ पर तैनात राजपूत सैनिकों के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावज़ूद वह चित्तौड़ के क़िले में घुस नहीं पाया। तब अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चित्तौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि “हम तो आपसे मित्रता करना चाहते हैं, रानी की सुन्दरता के बारे में बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुँह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली वापस लौट जायेंगे।” रत्नसिंह ख़िलज़ी का यह सन्देश सुनकर आगबबूला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि “मेरे कारण व्यर्थ ही चित्तौड़ के सैनिकों का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है।”
रानी को अपनी नहीं पूरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थीं कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाए और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अलाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी। रानी ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अलाउद्दीन रानी के मुखड़े को देखने के लिए इतना बेक़रार है तो दर्पण में उसके प्रतिबिंब को देख सकता है। अलाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है और उसकी बदनामी होगी, उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। चित्तौड़ के क़िले में अलाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अतिथि की तरह किया। रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचोंबीच था। दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आइने के सामने बिठाया गया। आइने से खिड़की के ज़रिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीं से अलाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया। सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उनका सौन्दर्य देखकर अलाउद्दीन चकित रह गया और थोड़ी ही देर तक दिखने वाले महारानी के प्रतिबिंब को देखते हुए उसने कहा- “इस अलौकिक सुंदरी को अपना बना कर ही दम लूँगा। अब जो भी हो, इसका अपहरण करके ही सही, इसे ले जाऊँगा।”
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अलाउद्दीन ने अपने इस लक्ष्य को साधने के लिए एक योजना भी बना ली। महाराज के आतिथ्य पर आनंदित होने का नाटक करते हुए प्यार से उसने उन्हें गले लगाया। चूँकि रानी का प्रतिबिंब देखने मात्र के लिए सुल्तान अकेले आया था, इसलिए महराजा रत्नसिंह निरायुध, अंगरक्षकों के बिना बातें करते हुए सुल्तान के साथ गए। अलाउद्दीन से द्वार के बाहर आकर राणा रत्नसिंह ने कहा- “हमें मित्रों की तरह रहना था, पर शत्रुओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यह भाग्य का खेल नहीं तो और क्या है?” तब तक अंधेरा छा चुका था। आख़िरी बार वे दोनों गले मिले। मौका पाकर ख़िलज़ी ने जैसे ही इशारा किया झाड़ियों के पीछे से आये उसके सिपाहियों ने हथियारविहीन राणा को घेर लिया। मैदान में गाड़े गये खेमों में उसे ले गए। अब राजा का उनसे बचना असंभव था। रत्नसिंह को क़ैद करने के बाद अलाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा। रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उन्होंने अलाउद्दीन को सन्देश भेजा- “मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करें।”
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रानी का ऐसा सन्देश पाकर अलाउद्दीन की ख़ुशी का ठिकाना न रहा और उस अद्वितीय सुंदरी रानी को पाने के लिए बेताब सुल्तान ने फ़ौरन रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया। उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए। डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया। इस तरह पूरी तैयारी कर रानी अलाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उनकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे। अलाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के क़ाफ़िले को दूर से देख रहे थे। सुल्तान ख़िलज़ी खेमों के बीच में बड़ी ही बेचैनी से रानी पद्मिनी के आने का इंतज़ार करने लगा। तब उसके पास गोरा नामक हट्टा-कट्टा एक राजपूत योद्धा आया और कहा- “सरकार, महारानी को अंतिम बार महाराज को देखने की आकांक्षा है। उनकी विनती कृपया स्वीकार कीजिए।”
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सुल्तान सोच में पड़ गया तो गोरा ने फिर से कहा- “क्या महारानी की बातों पर अब भी आपको विश्वास नहीं होता?” यह कहते हुए जैसे ही उसने पालकी की ओर अपना हाथ उठाया, तो उस पालकी में से एक सहेली ने परदे को थोड़ा हटाया। मशालों की रौशनी में सुंदरी को देखकर सुलतान के मुँह से निकल पड़ा “वाह, सौंदर्य हो तो ऐसा हो।” वह खुशी से फूल उठा। रानी पद्मिनी को उनके पति से मिलने की इज़ाज़त दे दी। पहली पालकी उस ओर गयी, जहाँ महाराज क़ैद थे। राणा रत्नसिंह को रिहा करने के लिए जैसे ही सीटी बजी, पालकियों में से दो हज़ार आठ सौ सैनिक हथियार सहित बाहर कूद पड़े। पालकियाँ ढोने वाले कहार भी सैनिक ही थे। उन्होंने म्यानों से तलवारें निकालीं और जो भी शत्रु हाथ में आया, उसे मार डाला। इस आकस्मिक परिवर्तन पर सुल्तान हक्का-बक्का रह गया। उसके सैनिक तितर-बितर हो गए और अपनी जानें बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भागने लगे। कुछ और पालकियाँ पहाड़ पर क़िले की ओर से निकलीं। उनमें रानी के होने की उम्मीद लेकर शत्रु सैनिकों ने उनका पीछा किया, पर बादल नामक एक जवान योद्धा के नेतृत्व में राजपूत सैनिकों ने उन पर हमला किया। एक पालकी में बैठकर महाराज और गोरा सकुशल क़िले में पहुँच गए।
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इसके बाद गोरा लौट आया और दुश्मनों का सामना किया। गोरा और सुल्तान के बीच में भयंकर युद्ध हुआ। इसमें गोरा ने अद्भुत साहस दिखाया, लेकिन दुर्भाग्यवश दुश्मनों ने चारों ओर से गोरा को घेर लिया और उसका सिर काट डाला। उस स्थिति में भी गोरा तलवार चलता रहा। उसने सुलतान के घोड़े के दो टुकड़े कर दिए। सुलतान नीचे गिर गया। भयभीत सुल्तान सेना सहित दिल्ली की ओर भागा। रानी पद्मिनी अपने चाचा गोरा व भाई बादल की सहायता से व्यूह रचकर शत्रुओं से बच सकती थी, पर वह क़िले से बाहर ही नहीं आई। सुल्तान ने दर्पण में जो प्रतिबिंब देखा था, वह उनकी सहेली का था। पालकी में जो दिखाई पड़ी, वह वही सहेली थी।
दिल को दिल के करीब लाती हैं बोलियाँ!
राजदंपति फिर से मिलन पर खुश तो हुए, लेकिन गोरा की मृत्यु पर उन्हें बहुत दु:ख हुआ। इस तरह कुछ वर्ष गुजर गए। एक बार राणा रत्नसिंह का जन्मदिन बहुत जोर-शोर के साथ मनाया गया। इस हार से अलाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चित्तौड़ विजय करने के लिए ठान ली थी। आखिर उसके छह महीने से ज़्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण क़िले में खाद्य सामग्री का अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया। जौहर के लिए गोमुख के उत्तर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया। रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया। जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी भी हतप्रभ हो गया। महाराणा रत्नसिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर 30000 राजपूत सैनिक क़िले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति ख़िलज़ी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ। बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक़्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया है-
बादल बारह बरस रो, लड़ियों लाखां साथ।
सारी दुनिया पेखियो, वो खांडा वै हाथ।।
रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा को निभाते हुए सती हुईं। यह लोक गाथा आज भी राजस्थान की जनता के ह्रदय में बसी है। और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।
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