तुलसी विपदा के सखा धीरज, धर्म, विवेक! - Khabar NonStop
पिछले साल की बात है मैं वाराणसी गया हुआ था। हमारे मेजबान डॉक्टर शैलेंद्र सिंह, जो कि जिला अस्पताल में चिकित्सक हैं, ने मेरी अगवानी करते हुए दो बातें कहीं। एक तो आप वाराणसी शहर में कार की बजाय बाइक का इस्तेमाल करें और जहां कहीं भी जाम लगा हो कतई मत हड़बड़ी दिखाएं। थोड़ी ही देर बाद जाम अपने आप खत्म हो जाएगा। हुआ भी यही। असी घाट के करीब जब हम गुजर रहे थे तो सामने से एक डाक वैन आ रही थी और सड़क के बीचोबीच तीन सांड़ पसरे थे। हमारे मेजबान ने अपनी बाइक रोकी और आराम से खड़े हो गए। उस समय धूप भी खूब थी। मुझे बेचैनी होने लगी और मैने कहा कि जल्दी से निकलने का कोई रास्ता नहीं है क्या यह सुनकर हमारे मेजबान डॉक्टर शैलेंद्र सिंह ने कहा कि आप घबराएं नहीं यह जाम अपने आप ही हटेगा। और थोड़ी ही देर बाद वे सांड़ वहां से हट गए और रास्ता खुल गया। अब अगर वह वाराणसी की बजाय दिल्ली होता तो इतनी देर में हंगामा मच जाता। हालांकि रास्ता खुलने में वक्त इतना ही लगता मगर किसी के पास यह पेशेंस नहीं होता कि जाम खुलने का इंतजार किया जाए।
दरअसल हम लोग अधीर होते जा रहे हैं। शहरी लोगों का धीरज आजकल चुकता जा रहा है। आप पाएंगे कि अक्सर छोटी-छोटी बातों पर मारपीट होने लगती है और कहीं भी आपको गाड़ी आगे बढ़ाने जैसे मामूली मसलों पर भी झगड़ते हुए लोग मिल जाएंगे। मनुष्य के लिए जो गुण अपरिहार्य बताए गए हैं उनमें एक धीरज बरतने या धैर्य रखने का भी है। अगर आपके अंदर धीरज है तो कोई भी मसला हो आप उससे पार पा ही जाएंगे। हो सकता है कि थोड़ा वक्त लगे मगर धीरज के साथ बरता गया आचरण और निश्चित ही फलदायक होता है। जब आप उत्तेजित हो तो थोड़ा-सा भी संयम
बरतें तो शायद किसी बड़े संकट या हादसे से बच सकते हैं। आजकल इन घटनाओं को रोडरेज कहते हैं। यानी जब छोटी-सी बात पर सड़क पर झगड़ा हो जाए। यह अधीरता की समस्या कई वजह से है। एक तो लोग कई दूसरी बातों से परेशान रहते हैं और जब वे उसका हल नहीं तलाश पाते तो हड़बड़ी करने लगते हैं। यह हड़बड़ी ही झगड़े के मूल में होती है।
अधीर होना एक तरह की मानसिक विकृति है। तुलसीदास ने लिखा है कि तुलसी विपदा के सखा धीरज, धर्म, विवेक। यानी विपत्ति के समय आपके तीन ही मित्र हैं धीरज, आपका धर्म और आपका विवेक। अर्थात अगर मनुष्य में धीरज नहीं है तो वह किसी भी विपत्ति से आसानी से पार नहीं पा सकता। पेशेंस बरतना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। अगर संकट के वक्त मनुष्य अपना धैर्य बनाए रखे तो वह अवश्य अपने मकसद में कामयाब होगा। मनुष्य अपने सारे काम बिगाड़ता तब ही है जब वह हड़बड़ी करने लगता है अथवा सही-गलत का निर्णय करने में अक्षम रहता है। आप सब ने वह कहानी सुनी ही होगी कि एक बार एक स्त्री एक महात्मा जी के पास पहुंची और रोना रोया कि महाराज मेरे और मेरे पति के बीच अक्सर झगड़ा होता है और इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि कभी-कभी तो लगता है कि घर न टूट जाए। महात्मा जी ने उसे एक शीशी दी और कहा कि अब जब भी घर में पति से झगड़ा हो तो फौरन यह शीशी अपने मुंह में डाल लेना। उस शाम पति से जब कहासुनी हुई तो स्त्री ने वैस ही किया जैसा कि महात्मा जी ने कहा था। पति थोड़ी देर तक तो बोलता रहा फिर जब पाया कि पत्नी कोई जवाब नहीं दे रही तो चुप हो गया। स्त्री को महात्मा जी का यह नुस्खा तो कमाल का लगा। वह एक दिन फिर महात्मा जी के पास गई और बोली कि महाराज शीशी की दवा तो खत्म हो गई है आप और दूसरी शीशी दीजिए। तब महात्मा जी मुस्करा कर बोले- पगली इसमें दवा थी ही कहां यह तो खाली शीशी थी। जब भी झगड़ा हो तो एक पक्ष चुप साध जाए तो अपने आप झगड़ा समाप्त। कहने का तात्पर्य यह कि अगर झगड़े वक्त कोई भी एक पक्ष अगर धीरज बरत ले तो शायद मारपीट या हिंसा की नौबत ही नहीं आए। वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने राम के चरित्र के बारे में लिखा है कि
इक्ष्वाकु वंश प्रभवो रामैनाम जनैश्रुता:।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान धृतिमान वशी॥
यानी इक्ष्वाकु वंश में पैदा हुए राम में जो प्रमुख गुण थे उनमें उनका द्युतिमान अर्थात आभायुक्त और धृतिमान अर्थात धैर्यवान सर्वोपरि हैं। वे संयमी भी हैं। इससे जाहिर है कि हमारे मिथकीय इङ्क्षतहास में भी नायक के जो गुण बताए गए हैं उनमें उसका धीरज प्रमुख है। जिस व्यक्ति के पास धैर्य है, संयम है वही असल नायक है। कृष्ण ने अपने फुफेरे भाई शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा किए। मगर जब यह संख्या सौ पार कर गई तो कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। इन सब से इसी की पुष्टि होती है कि श्रेष्ठ मनुष्य का लक्षण उसका धैर्यवान होना है।
मगर यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आज के समय में हमारे पास धैर्य नहीं बचा है। हर व्यक्ति को जल्दी है कि वह अपना काम पहले निपटा ले साथी जाए भाड़ में नतीजा यह होता है कि न तो वह अपना कामपहले कर पाता है न दूसरे को ढंग से अपना काम निपटाने देता है। इस सबके कारण ही सारे काम अटक जाते हैं और समाज में एक अफरा-तफरी आ जाती है। अगर समाज में सम न रहे तो उस समाज का टूटना तय है। समाज के स्वस्थ रहने और मजबूत बनने का एक ही तरीका है कि उस समाज के लोग धैर्यवान और दृढ़निश्चयी हों। जब धीरज आएगा तो समाज से हड़बड़ी स्वत: नष्ट हो जाएगी।
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