मुसलमानों ने बनवाए मंदिर भी! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
आज जो हमारे देश में हिंदू-मुसलमान तना-तनी बढ़ती जा रही है, वह अचानक नहीं हुई बल्कि इसके पीछे सोची-समझी साज़िश है। कुछ ताकतें इसे हवा दे रही हैं। लेकिन इन निहित स्वार्थी ताकतों को यह नहीं पता कि इसके दुष्परिणाम उन्हें भी जला देंगे। दरअसल सांप्रदायिकता पूंजीवाद और औद्योगिक सभ्यता की देन है। कारपोरेट घरानों द्वारा बाजार हथियाने के लिए हिंदू-मुस्लिम द्वेष पैदा किया जाता है। बाजारवादी शक्तियां सांप्रदायिकता का हथकंडा अपनाती हैं। अपनी सांप्रदाकियता की धार को तेज करने के लिए वे अतीत को भी सांप्रदायिक बनाने का कुत्सित प्रयास करती हैं।
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इसमें कोई शक नहीं कि सामंती काल में भी मंदिर-मस्जिद ढहाए गए पर उसके पीछे सोच सांप्रदायिक नहीं विजित नरेश के सारे प्रतीकों को ध्वस्त करना था। हिंदू शासकों ने भी जब कोई राज्य जीता तो वहां के मंदिर तोड़े और पठानों व मुगलों ने भी जब किसी मुस्लिम राजा को हराया तब मस्जिदें भी तोड़ीं। ये अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए उनके पूजा स्थल बनवाते भी थे। तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जब हिंदू शासकों ने मस्जिदें बनवाने के लिए अनुदान ही नहीं दिया बल्कि बनवाया। और मुस्लिम शासकों ने मंदिरों के लिए माफी की जमीन दी। किसी भी सामंती शासक ने किसी धर्म पर बाज़ार के दबाव में प्रहार नहीं किया। उनका मकसद राज्य जीतना था।
जो लोग यह सोचते हैं कि फिर इतनी भारी संख्या में मुसलमान कैसे बने क्योंकि तुर्क जब आए तो मुठ्ठी भर ही थे। तो इसका भी एक मजेदार तथ्य है और वह भी उनके बाद आए योरोपियन व्यापारी ईस्ट इंडिया कंपनी के काल का। शुरू में अंग्रेजों को लगा कि अगर इंडिया के हिंदुओं का सवर्ण तबका ईसाई बना लिया जाए तो यह देश उनके कहे मुताबिक चलेगा। उन्होंने गोआ, कोचीन और कोलकाता में ब्राह्मणों और हिंदू समाज की अन्य ऊँची जातियों को ईसाई बनाने की मुहिम चलाई। कुछ बने भी जैसे की बांग्ला के मशहूर कवि माइकेल मधुसूदन दत्त तथा तमाम बनर्जी और मुखर्जी परिवार। इसी तरह यूपी के कुमायूं में तमाम पंत और पांडे भी ईसाई बन गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं क्योंकि जो ब्राह्मण ईसाई बनते उसे उसके ही परिवारजन और उसकी जाति उनको अलग कर देती और बाकी का कुनबा जस का तस बना रहता।
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तब ईसाई मिशनरियों को लगा कि हिन्दुओं की सवर्ण जातियों से अच्छा है कि अन्य जातियों पर डोरे डाले जाएं। आसान तरीका था यह क्योंकि अधिसंख्य तबका हिंदू धर्म की पूजा पद्घति से दूर था। इसमें सफलता तो मिली लेकिन यह गुर कारगर नहीं रहा। इसकी वजह थी मिशनरीज पर गोरों को दबाव होना। यह वह दौर था जब समानता, बराबरी और मानवता का पाठ लोगों ने पढ़ा और इसका असर यह हुआ कि लोगों को लगा कि समानता के मामले में इस्लाम ज्यादा बराबरी देता है। जब अपना मूलधर्म छोड़कर यह तबका अन्य धर्मों की तरफ जाने लगा तो उसे सूफी संतों की उदारता, सादगी और बराबरी पर जोर अधिक रास आई। इसलिए आप पाएंगे कि इस्लाम में जाने का रुझान 18 वीं व 19वीं सदी में सबसे अधिक हुआ पर इस्लाम में जो लोग गए वे या तो हिंदू धर्म की ब्राह्मण श्रेष्ठता के कारण किनारे पड़े थे अथवा वे हिंदू थे ही नहीं। वे नाथ, कनफटा, योगी और निरंजनी समाज के थे जहां एकेश्वरवाद, शून्यवाद और समान आत्मा का प्रचलन था इसलिए इस्लाम अंगीकार करने में उन्हें हिचक नहीं हुई। इसलिए आज यह कहना कि हिन्दुओं का उपेक्षित तबका हमारे माल हैं आरएसएस की बेहयाई है।
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