कोहरे से थम क्यों जाते हैं पहिये! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
पिछले साल नवंबर में मैं कानपुर से दिल्ली आ रहा था। श्रम-शक्ति एक्सप्रेस कानपुर से रात पौने बारह बजे छूटती है और नानस्टॉप चलते हुए सुबह साढ़े छह दिल्ली। सेकंड एसी कोच था और ऊपर की बर्थ जिसमें डिस्टर्बेन्स भी कम होता है सो टीटीआई द्वारा टिकट चेक हो जाने के बाद मैं लेटा और सो गया। सुबह नींद खुली तो आदतन मोबाइल आन किया। सुबह के छह बज रहे थे और कोच में लगभग सभी लोग सो रहे थे। ट्रेन की गति बहुत धीमी थी। मैने सोचा कि नई दिल्ली स्टेशन आने वाला होगा। मैं उतरा और परदा उठाकर बाहर की तरफ देखा। उजाला फूट रहा था। मैं टॉयलेट की तरफ चला गया और फ्रेश होने के बाद मैने कोच का दरवाजा खोला तो पाया कि गाड़ी किसी स्टेशन पर खड़ी है। चूंकि गाड़ी लूप लाइन पर थी इसलिए स्टेशन तो नहीं पता चल रहा था। ट्रेन के करीब से गुजर रहे एक वेंडर को बुलाया और स्टेशन का नाम पूछा तो सन्न रह गया। गाड़ी अभी इटावा भी नहीं पहुंची थी और इकदिल पर खड़ी थी। यानी सारी रात धड़ाधड़ चलने के बाद हमारी ट्रेन बमुश्किल सौ किमी की दूरी तय कर पाई थी। आज तो मौसम भी साफ लग रहा था फिर ट्रेन इतनी देरी से क्यों चल रही है यह जानने के लिए मैं नीचे उतरा और एक टीटीआई से पूछा तो उसने बताया कि चूंकि कल रात से ही दिल्ली की तरफ बहुत कोहरा है इसलिए आगे जाने वाली ट्रेनों से इस ट्रेन का रास्ता रोक रखा है। यानी जैसे-जैसे आगे चल रही ट्रेनें खिसकेंगी तब ही इसका नंबर आएगा।
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नवंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर मार्च के पहले हफ्ते तक पूरे उत्तर भारत में कोहरे का यही हाल रहता है। ट्रेनें लेट होती जाती हैं और हवाई उड़ानें रद्द। हाईवेज पर रोजाना गाडिय़ां आगे-पीछे भिड़ती हैं और लोग मरते हैं पर आज तक इस कोहरे से निपटने का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सका। येलो लाइट्स और पटाखे छुड़ाते हुए ट्रेन चलाना एक टोटके से अधिक कारगर नहीं हो पाया है। एनएच वन हो या टू सब पर चलने वाले वाहन या तो तड़के रुक जाते हैं अथवा ऊपर वाले के भरोसे गाड़ी चलानी पड़ती है। जिन लोगों को नोएडा से आगरा जाने के लिए यमुना एक्सप्रेस वे मुफीद रहता है उन्हें पता होगा कि नवंबर से फरवरी तक किसी भी रोज वहां कोहरे का ऐसा झोंका आता है कि यकायक गाडिय़ों के पहिये थम जाते हैं और तब पीछे से आ रहे वाहन आगे वाले वाहन को कुचलते हुए आगे बढऩे का उद्यत नजर आते हैं। यकायक यह कोहरे का पेच आ जाना इतना खतरनाक होता है कि कुछ देर तक तो चालक को कुछ दिखता ही नहीं और सौ की ऊपर की स्पीड से चले आ रहे वाहन पर अचानक ब्रेक लगाए जाते हैं तो भी रुकते-रुकते वह सौ मीटर की दूरी तो तय ही कर लेता है नतीजन दुर्घटना को कोई रोक नहीं पाता।
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लेकिन प्रकृति की यह निर्ममता भी जीवन की गति को जरा भी रोक नहीं पाती है। अलस्सुबह टहलने निकले बुजुर्गों से लेकर स्कूल जाते बच्चों और नौकरी पर निकले लोगों की रेलमपेल सड़कों पर वैसी ही व्यस्तता बनाए रखती है जैसी कि आम दिनों में होती है। घने कोहरे में सड़क पर गाड़ी चलाते हुए लगता है कि काश! हमारी आँखें कोहरे की चादर के पार देख सकतीं। हमें नहीं पता कहां कोई डंफर यमदूत बनकर हमें लील जाए अथवा कोई ट्रैक्टर अपनी ट्राली समेत हमारी गाड़ी के ऊपर आ गिरे। सड़क सरकार ने बनवा दी है पर सड़क पर चलने वालों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। भारत की भौगोलिक स्थिति ही कुछ ऐसी है कि यहां पर न तो कोहरे से निजात पाई जा सकती है न भीषण गर्मी से और न ही अतिवृष्टि से। तीन तरफ से समुद्र से घिरे इस भारत देश में पूरा उत्तरी इलाका हिमालय पर्वत से आच्छादित है तो पश्चिम के एक बड़े हिस्से में थार का मरुस्थल पर है। इसलिए उत्तर भारत में हिमालय की तराई और गंगा-यमुना के मैदानी इलाके में कोहरे को रोका नहीं जा सकता। यह प्राकृतिक अनिवार्यता है पर कोहरे के बावजूद हवाई उड़ानों तथा ट्रेनों का समय से परिचालन अवश्य हो सकता है तथा हाईवे पर कारों को बिना रुकावट चलाया जा सकता है। दुनिया के बहुत सारे मुल्कों में इसका इंतजाम बखूबी किया गया है। वहां पर यह सारा टैफिक बेरोकटोक दौड़ता है तब प्रश्न उठता है कि भारत में ऐसा क्यों नहीं?
हमारे एक सहकर्मी हैं जो अरसे तक नार्वे में रहे हैं। जिन्हें योरोप की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान होगा उन्हें यह ज्ञात होगा कि नार्वे उत्तरी ध्रुव के पास का ऐसा भूभाग है जहां साल में छह महीने सूरज नहीं डूबता और बाकी में निकलता नहीं है। इसके बावजूद इस छोटे से देश के वासियों ने अपनी मेहनत, लगन और जिजीविषा के बूते प्रकृति की इस निर्ममता के खिलाफ एक ऐसा तंत्र विकसित कर लिया है कि नार्वे उन विकसित मुल्कों में से है जो दुनिया भर को अपनी जाने कितनी चीजें निर्यात करता है और बदले में खाद्य सामग्री खरीदता है। हमारे वो सहकर्मी बताते हैं कि नार्वे में सोशल सिक्योरिटी इतनी ज्यादा है कि कुछ वर्षों वहां काम करने की एवज मे उन्हें 62 साल की उम्र के बाद नार्वेजियन मुद्रा में इतनी ज्यादा पेंशन मिलेगी जिसकी कीमत यहां कोई 10500/- महीना होती है। एक छोटा सा मुल्क नार्वे साइंस में भी हमसे कहीं आगे है। हम अंतरिक्ष तथा दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव की अपनी विजय यात्राओं का कितना भी स्तुतिगान करते रहें लेकिन योरोप का हर देश वहां पहले से झंडा गाड़े है। लेकिन ये मुल्क अपने देश के वासियों को यह भरोसा भी देते हैं कि आपकी सुरक्षा की गारंटी भी हमारे पास है। घने कोहरे में भी वहां के विमान सकुशल लैंडिंग करते हैं और त्वरित सेवाओं के बावजूद उनके रन वे पर इतनी जगह होती है कि विमान समय पर उतर जाएं। हर ट्रैक पर वाहन सुरक्षित गुजरते हैं। योरोप ही नहीं एशिया में भी चीन, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया और कोरिया तक प्रकृति की विभीषिकाओं से हमारी तुलना में ज्यादा सुगमता और सहजता से लड़ लेते हैं लेकिन हमारे देश में अभी जनता को मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नहीं हैं। चीन और जापान में बुलेट ट्रेन की रफ्तार इतनी है कि दिल्ली से कानपुर तक की दूरी को महज 75 मिनट में पूरा किया जा सकता है।
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