फिल्में अगर किताबों की कहानी का बुरा हाल करेंं तो मुझे एतराज : नोवोनील चक्रबर्ती
जयपुर। माता-पिता अपने बच्चे को किताबे पढऩे के लिए कहते हैं मगर जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के सामने मोबाइल और लैपटॉप छोड़ के किताबे पढ़ें। इसलिए जरूरी है कि इस बात को डाटने से ज्यादा बच्चों को प्यार से और खेल के रूप में समझाएं। देश की बेस्ट सेलर बुक में अपनी बुक फोरेवर इज लाय फोरेवर इज ट्रू को शामिल कर चुके कोलकाता बेस्ट ऑथर नोवोनील चक्रबर्ती शुक्रवार को गुलाबी नगरी पहुचें। जहाँ उन्होंने चोमू हाउस स्थित रेस्टॉरेंट जयपुर मॉडल किचन में रजत बुक कार्नर की ओर से आयोजित बुक आर द स्मार्टेस्ट हैंड हेल्ड डिवाइस पर चर्चा की।
नोवोनील चक्रबर्ती ने चर्चा के विषय पर गहन चिंतन करते हुए कहा कि आज शायद किताबें लाइब्रेरी की शोभा बढ़ा रही है, मगर आज के युवाओं के हाथों में कभी देखने को नहीं मिलती। इसके कारण के बारे में सोचे तो शायद वो सच बहुत डराने वाला होगा। मुझे लगता है कि हर बच्चे को पढऩे की लगन स्कूल से मिलती है। वहां अगर टीचर शार्ट स्टोरीज की ओर बच्चों का ध्यान खीचें तो उस से उनकी पढऩे की रूचि बढ़ सकती है। रजत बुक कार्नर से मोहित बत्रा कहते हैं कि आज किताबों की जगह किंडल मोबाइल और लैपटॉप ने ले ली है। आज देश में कई ऐसे उदाहरण हैं जिसमे छोटे छोटे बच्चों को सोशल मीडिया साइट्स पर अपने दिन का ज्यादा समय बिताते देखा गया है। ऐसे बच्चों के पेरेंट्स के लिए जरूरी है कि वह खुद अपने बच्चों को गैजेट से दूर रखने की कोशिश करें। कार्यक्रम में कई बुक लवर्स ने गैजेट्स, सोशल मीडिया एडिक्शन और रीडिंग लव से जुड़े अपने अनुभव शेयर किए। कार्यक्रम के दौरान जयपुर मॉडर्न किचन के ऑनर मनीष भी मौजूद रहे।
राइटर बनने के लिए किसी को कॉपी ना करें
मैं कोलकाता का रहने वाला हूँ। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मेरे मन में कई सारी कहनियाँ गढऩे लगी। मैंने उन्हें एक जगह लिख डाला और एक शार्ट स्टोरीज की नॉवल तैयार हो गई। लोगों को वह काफी पसंद आई। जिसके साथ लिखने का कारवा जारी रहा। मुझे हर जॉनर में कहानी लिखने का शौख है।
फिल्म में दिख रही स्क्रिप्ट किताब की कहानी से अच्छी हो
कहानियों पर फिल्म बनने और आर्ट फ्रीडम की बात पर नोवोनील कहते हैं कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है अगर मेरी किताबों की कहानियों पर कोई फिल्म बनाना चाहे। मुझे सिर्फ इस बात से ऐतराज है कि फिल्म में दिख रही स्क्रिप्ट किताब की कहानी से अच्छी हो। अगर आर्ट फ्रीडम के नाम पर किताब की कहानी का फिल्म में बुरा हाल होता है तो यह गलत है।
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