जानिए, रानी पद्मावती का इतिहास!
डेस्क: आज हम आपको बताने जा रहे हैं चित्तौड़ की शान रावल रतन सिंह जी के बारे में कि वे कौन थे और चित्तौड़ में खिलजी की इतनी रुचि क्यों थी? संजय लीला भंसाली की बहुचर्चित फिल्म पद्मावती का ट्रेलर आ चुका है और जल्द ही फिल्म रिलीज होने वाली है। लगातार फिल्म का विरोध भी हो रहा है, क्योंकि मामला भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से जुड़ा है।
आइए जानते हैं…
रावल रतन सिंह जी कौन थे
रावल रतन सिंह मेवाड़ के सिसोदिया वंश के राजा थे जो गुहिल वंश की रावल शाखा से ताल्लुक रखते थे। वे अपनी शाखा के अंतिम शासक थे।रतन सिंह को दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन ख़िलजी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद उनका साम्राज्य खत्म हो गया था। रावल रतन सिंह जी का विवाह रानी पद्मिनी से हुआ था।
पद्मावती की रावल रतन सिंह जी से शादी
ऐसा कहा जाता है कि रतन सिंह ने एक स्वयंवर में रानी पद्मिनी से शादी की थी। अलाउद्दीन ख़िलजी और रतन सिंह के बीच टकराव की भी कई कहानियां मिलती हैं। एक कहानी के मुताबिक सुल्तान ने राजा को बंदी बना लिया था। बाद में राजा के लड़ाकों गौरा और बादल ने उन्हें आज़ाद कराया। जिनके बारे में राजस्थान में अनेक लोक गीत प्रचलित हैं।
इतिहास क्या कहता है
अलाउद्दीन ख़िलजी और रतन सिंह के बीच जो टकराव था वो सिर्फ पद्मावती के लिए नहीं, बल्कि सत्ता का भी संघर्ष था। जिसकी शुरुआत मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच साल 1191 में होती है। तुर्कों और राजपूतों के बीच टकराव के बाद दिल्ली के शासकों और राजपूतों के बीच संघर्ष शुरू हुआ था। दरअसल, संघर्ष पहले से चल रहा था और फिर ख़िलजी आया।
दिल्ली शासकों की चित्तौड़ में इतनी रुचि क्यों थी
दिल्ली शासकों की चित्तौड़ में इतनी दिलचस्पी इसलिए थी, क्योंकि उस समय में उनके खिलाफ कोई खड़े होने की क्षमता रखते थे तो वे राजस्थान के राजपूत ही थे। साथ ही, गुजरात जाने के लिए भी यही रास्ता था। जंग में जीतने के बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने राजा रतन सिंह को बंदी बनाया या मारा ये तो बताना मुश्किल है।
ख़िज़्राबाद बना था चित्तौड़
कहा जाता है कि 7 महीने तक जंग चली। रतन सिंह आख़िर तक लड़े़ और और उन्होंने साल 1302 में पद संभाला था। उसके तुरंत बाद उन्हें सल्तनत की चुनौती का सामना करना पड़ा। ऐसा भी कहा जाता है कि मुस्लिम शासकों ने जंग के दौरान कई मंदिर बर्बाद किए और इसका नाम बदलकर ख़िज़्राबाद किया गया। उसके बाद सन् 1325 में यहां तुगलक आए मगर मेवाड़ में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी।
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