नासा: 1988 के बाद ओजोन में बना सबसे छोटा छेद - Khabar NonStop
वाशिंगटन। अंटार्कटिका क्षेत्र में हर साल बनने वाले ओजोन छेद में इस साल सितंबर में 1988 के बाद सबसे अधिक घटाव देखा गया है। नासा और नेशनल ओसनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के वैज्ञानिकों ने इस बारे में घोषणा की है।
वैज्ञानिकों का कहना
वैज्ञानिकों ने बताया कि गर्म वायु के कारण हर साल सितंबर में किए जाने वाली जांच में अंटार्कटिक क्षेत्र के ऊपर ओजोन परत का छेद 1988 के बाद सबसे छोटा पा गया है। नासा के मुताबिक, 11 सितंबर को ओजोन छेद में सबसे ज्यादा विस्तार हुआ, जोकि आकार में तकरीबन अमेरिका के क्षेत्र का ढाई गुना यानी 76 लाख वर्गमील था। इसके बाद सितंबर से अक्टूबर तक ये छोटा होता रहा।
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न्यूमैन का कहना
नासा के मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट स्थित गोड्डार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में प्रमुख भूवैज्ञानिक, पॉल ए। न्यूमैन ने कहा, इस साल अंटार्कटिक ओजोन छेद असाधारण रूप से छोटा पाया गया है। इस साल ओजोन छेद में इस परिवर्तन के पीछे वैज्ञानिक अंटार्कटिक भंवर की अस्थिरता व ज्यादा गर्मी, जोकि अंटार्कटिक क्षेत्र के वायुमंडल में दक्षिणावर्त बनने वाले समतापमंडलीय निम्न दबाव के कारण उत्पन्न होती है।
सबसे पहले छेद का पता 1985 में चला
पिछले साल 2016 में ओजोन छेद सबसे बड़ा 89 लाख वर्गमील का पाया गया था। इससे पिछले साल 2015 से 20 लाख वर्गमील से छोटा था। सबसे पहले ओजोन छेद का पता 1985 में लगाया गया था। दाक्षिणी गोलार्ध में सिंतबर से दिसंबर के दौरान शीत ऋतु के बाद सूर्य की किरणों की वापसी से जो उत्प्रेरक प्रभाव पड़ता है, उससे अंटार्कटिक क्षेत्र में ओजोन छेद का निर्माण होता है।
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ये बिमारियां होने का खतरा
अमूमन धरती से 25 मील ऊपर समताप मंडल में ओजोन परत है, जोकि सनस्क्रीन की तरह काम करती है और पृथ्वी को सूर्य की अल्ट्रावायोलेट किरणों के हानिकारक प्रभावों से बचाती है। अल्ट्रावायोलेट किरणों के विकरण से लोगों को कैंसर, मोतियाबिंद जैसे रोगों का खतरा रहता है। साथ ही इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी नष्ट हो सकती है।
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