अयोध्या में राम कहाँ हैं! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
फिर कहा जाने लगा है कि अयोध्या में एक भव्य मंदिर बनेगा। लेकिन यह सब सुनते-सुनते कान पक गए। बत्तीस साल पहले 1985 से, यानी जब से राम जन्म भूमि का ताला खुला, तब से हमने यही सुना है कि विश्व हिंदू परिषद वहां एक मन्दिर बनवाएगी। मन्दिर तो आज तक नहीं बना पर रामलला जरूर मस्जिद परिसर के भवन से उठकर तम्बू में आ गए। ऐसे तम्बू में जो धूप में घमाता है और बरसात में भीगता है तथा जाड़े में जिसपर ओस पड़ी रहती है। लेकिन इसी बीच विहिप की राजनीति का ग्राफ उठता-गिरता रहा। जो पार्टी 1985 में लोकसभा के अंदर कुल दो सीटों में सिमटी थी, वह आज 293 पर जमी है। मैंने अपनी इन्हीं आँखों से अयोध्या को उजड़ते हुए देखा है। वह अयोध्या जो रामजन्म भूमि आन्दोलन के पहले सनातनी हिंदुओं का सबसे प्रतापी तीर्थ हुआ करती थी और जिसके बारे में कहा जाता था- “काशी बड़ी न मथुरा न विश्वनाथ दरबार, सबसे बड़ी अयोध्या जहाँ राम लीन अवतार!”वही अयोध्या आज उजाड़-सी पड़ी है। इसी अयोध्या को जब पिछले हफ्ते मैंने फिर देखा तो दुःख हुआ।
‘राजनीति में इत्तेफाक नहीं होते’
दरअसल अयोध्या में राम तब ही रमेंगे जब सत्य वहां रमेगा लेकिन सत्य के लिए कोई नहीं अड़ रहा। इसलिए अयोध्या सूनी पड़ी है। यूँ तो अयोध्या बहुत ही छोटा कस्बा है मुश्किल से तीन किमी की लंबाई चौड़ाई में बसा। मंदिरों, मठों और धर्मशालाओं के अतिरिक्त यहां कुछ है भी नहीं। सकरी और ऊँची-नीची गलियां और दोनों तरफ बने मकान जो लाखौरी ईटों से बने हुए हैं। मंदिर, मठ और मकान कोई भी इमारत मुझे वहां सौ-सवा सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं दिखी। मंदिरों और मठों का अगवाड़ा तो खूब रंगा पुता दिखा लेकिन पिछवाड़े की दीवालों पर बुरी तरह काई लगी हुई थी। गलियों में कतार से मिठाई की दूकानें जरूर दिखती हैं जिनमें बस बेसन के लड्डू, जलेबी, समोसे और चाय ही मिलती है। इक्का-दुक्का दूकानों में अंकल चिप्स, बिस्किट व नमकीन के पैकेट भी बिकते दिखे। पूरे कस्बे में सिर्फ एक दूकान पर मेडिकल स्टोर लिखा था जहां आयुर्वेद, एलोपैथी और होम्योपैथी की दवाएं एक साथ मिलती थीं। अयोध्या में पैदल चलना ही बेहतर रहता है क्योंकि रिक्शे यहां हैं नहीं और गाड़ी को इन गलियों से गुजारते हुए ले जाना किसी नट के करतब जैसा लगता है।
‘कांग्रेस को ख़त्म करना ही बेहतर था’
लेकिन किसी भी पर्व या नहान के वक़्त अय्ध्य में चहल-पहल खूब हो जाती है। चाहे पूरनमासी हो या अमावस्या अयोध्या में खूब लोग आ जाते हैं और तब यहाँ टिल धरने को जगह नहीं मिलती लेकिन अगले रोज़ फिर वही सन्नाटा। मुझे आज भी वहां ज्यादातर मंदिरों में सन्नाटा ही दिखा। सिवाय पुलिस और अर्धसैनिक बलों की आवाजाही के और कहीं कोई चहल पहल नहीं। मंदिरों में पुजारी मशीनी तरीके से प्रसाद को मूर्तियों के ऊपर फेंकते रहते हैं। उनकी उदासीन मुद्रा देखकर लगता ही नहीं कि यहां किसी को मंदिरों को बनाए रखने में दिलचस्पी है। मठों के बाहर बैरागी साधुओं के जत्थे माथे पर वैष्णवी तिलक लगाए सुमिरिनी फिराते रहते हैं। दुबले पतले इन बैरागियों को देखकर लगता है कि जैसे ये घर से भगा दिए गए हों और बाकी की उमर काटने के लिए इन्होंने अयोध्या की पनाह ली हुई है। हर आदमी का कद छोटा और पीठ पर कूबड़ निकला हुआ। मुझे इन कुबड़े पुजारियों, बैरागी साधुओं और लोकल लोगों को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। कई लोगों से इसकी वजह जानने की कोशिश भी की लेकिन कोई भी ठीक से जवाब नहीं दे पाया। कुछ ने बताया कि यहां का पानी खराब है तो कुछ के मुताबिक अयोध्या के लोगों को सीताजी ने श्राप दिया था कि जैसे यहां के लोगों ने उन्हें कष्ट दिया है वैसे ही यहां के लोग भी कभी खुश नहीं रह पाएंगे। लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि यहां के लोगों की कम लंबाई और कूबड़े होने की वजह यहां के पानी का खारा होना तथा यहां के खानपान में खट्टी चीजों का प्राधान्य है। आम और इमली का सेवन यहां के लोग सुबह शाम के भोजन में जरूर करते हैं। इमली आयुर्वेद में त्वचा और हड्डियों के लिए बहुत नुकसानदेह बताई गई है।
सबसे बड़ा धर्मान्तरण अम्बेडकर ने कराया था!
थोड़ी-बहुत चहल-पहल कनक भवन में दीखती है और बाकी की हनुमान गढ़ी में। कनक भवन के बारे में मान्यता है कि रानी कौशल्या ने सीता जी के ससुराल आने पर मुँह दिखाई की रस्म में उन्हे भेंट किया था। हालांकि वहां जो पत्थर लगा है उसमें लिखा है कि इसे ओरछा के महाराजा मधुकर शाह देव ने बनवाया। हनुमान गढ़ी में बंदरों की फौज और जमीन पर बिखरे लड्डुओं की चिपचिप के कारण वहां जाना मुश्किल होता है पर एक ऊँचे टीले पर बने इस मंदिर को देखने की तमन्ना तो रहती ही है। कहते हैं कि फैजाबाद नरेश शुजाउददौला की माँ ने इसे बनवाया था क्योंकि हनुमानबाहुक का पाठ करने से उनके कंधे का दर्द दूर हो गया था। बाकी अयोध्या सूनी-सूनी और उदास-सी प्रतीत होती है। मारवाड़ी सेठों की आलीशान धर्मशालाएं बस यूं ही धूल व गर्द से सनी खड़ी रहती हैं। यहां न तो कोई आता है न जाता। मथुरा, इलाहाबाद, वाराणसी से तुलना करें तो लगता है कि यहां से लोगों को कोई लगाव नहीं है। इससे अच्छा तो गुप्तार घाट और भरतकूप है। फैजाबाद शहर में कम से कम डोंगरा रेजीमेंट की ईष्ट देवी का मंदिर भी अयोध्या के किसी भी मंदिर से भव्य लगता है। यहां पर अयोध्या शोध संस्थान में मुलायम चचा की प्रेरणा से एक रामलीला का मंचन अहिर्निश जरूर होता है। वह दर्शनीय है।
अयोध्या की इस उदासीनता के बारे में एक दिलचस्प बात पता चली कि अयोध्या में जो कोई भी रहता है उस पर कलंक जरूर लगता है और न तो वह बस पाता है न उसकी आने वाली पीढिय़ाँ। क्योंकि सीता माँ ने अयोध्यावासियों को श्राप दिया था कि तुम लोगों ने एक निष्कलंकिनी स्त्री पर दोष लगाया है इसलिए तुम लोग कभी सुखी नहीं रह पाओगे। उनका श्राप फलीभूत हुआ। अपने सेवक हनुमान जी पर उन्हें अनुराग था इसलिए हनुमान गढ़ी तो फलीफूली पर अयोध्या उजड़ गई। इसीलिए ओरछा की राजमाता असली रामलला को अपने साथ ओरछा ले गईं। उन्हें सपना आया था कि रामलला उन्हें अपने साथ ओरछा ले चलने का आग्रह कर रहे हैं। मालूम हो कि राम लाला का मंदिर ओरछा में है। जो कि अयोध्या से लगभग चार सौ किमी दूर है। इसलिए वहां जब मस्जिद थी तब भी उसमें कोई नमाज वगैरह नहीं होती थी और न ही अब जब वहां मूर्ति स्थापित कर दी गई है तब भी कोई श्रृद्घालु वहां रामलला के दर्शन हेतु जाते हैं। इसे देख कर लगता है कि अयोध्या से रूठे राम अब ओरछा के रामराजा में बिराजते हैं। वहां की भव्यता और चहल-पहल अयोध्या के रामलला से कहीं ज्यादा है।
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