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देश का एकतरफा उदारतावाद ! - Khabar NonStop

Gauri Lankesh Murder

नई दिल्ली। देश में आजकल प्रोपगैंडा का दौर चल रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए प्रोपगैंडा कर रही है। लेकिन इस मामले में शायद भाजपा कुछ ज्यादा ही बदनाम है और अधिकांशतः कथित उदारतावादियों के निशाने पर रहती है। लेकिन ऐसा लगता है कि देश में उदारतावाद सिर्फ एकतरफा चल रहा है।

यूं तो कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर देश के कथित उदारतावादियों को घेरा जा सकता है। लेकिन यहां हम हाल ही में हुई कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के संबंध में बात करेंगे। गौरतलब है कि हाल ही में गौरी लंकेश की हत्या की जांच के लिए गठित एसआईटी ने दो संदिग्धों के स्केच जारी किए थे। लेकिन यहां एक और बात गौर करने लायक थी, जिस पर शायद मीडिया का ध्यान नहीं गया या फिर जान बूझकर इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया। वो बात ये थी कि गौरी लंकेश के मर्डर में अभी तक दक्षिणपंथी ताकतों के शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला है।

‘गौरी लंकेश मर्डर केस में दक्षिणपंथी ताकतों का नहीं कोई हाथ’

Gauri Lankesh Murder

बता दें कि जिस रात गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, उसके तुरंत बाद ही मीडिया और कथित उदारवादियों का जो रिएक्शन था, वो ये था कि गौरी लंकेश की हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठन या दक्षिणपंथी ताकतें है। हैरानी की बात है कि बिना किसी सबूत, जांच पड़ताल के गौरी लंकेश की हत्या के बाद दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरु हो गए और एक इस तरह का माहौल बन गया, जिसमें गौरी लंकेश के खिलाफ बोलना, एक तरह से गौरी लंकेश के मर्डर को सही ठहराना हो। हालांकि कुछ लोगों ने सचमुच बड़े ही गलत तरीके से गौरी लंकेश की हत्या को सही ठहराने की कोशिश की, जिस पर काफी बवाल भी हुआ था। वह सचमुच गलत है और उसकी आलोचना होनी ही चाहिए।

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वहीं इस पूरे मामले पर तुर्रा यह कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने गौरी लंकेश का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गौरी लंकेश को सिर्फ इसलिए राजकीय सम्मान दिया गया क्योंकि उनकी हत्या हुई, या फिर उनकी हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठनों का नाम आ रहा था। क्या यह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की राजनीति चमकाने की कोशिश नहीं थी ?

Gauri Lankesh Murder

बता दें कि कल ही एक महिला इंजीनियर को लोगों की भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीटा, क्योंकि वह गोहत्या का विरोध कर रही थी। लेकिन हैरानी की बात है कि इस तरह के मुद्दों पर कभी कोई उदारवादी अपनी आवाज बुलंद नहीं करता है। यदि कोई ऐसे मुद्दों पर बोलता है तो उसे सांप्रदायिक होने का तमगा दे दिया जाता है और उसके सारे तर्कों को सिर्फ सांप्रदायिकता की तराजू से तौला जाता है। बता दें कि यह हाल सिर्फ कर्नाटक या किसी एक राज्य का नहीं ब्लकि पूरे देश का है। शायद यही कारण है कि देश में उदारवादियों को शक की नजरों से देखा जा रहा है।



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