टीपू का शंकराचार्य को पत्र - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
दक्षिण में मैसूर साम्राज्य के अधीश्वर टीपू सुल्तान से अंग्रेज इतना डर गए थे कि उसकी लोकप्रियता से चिढ़कर उसे सांप्रदायिक करार दिया। चूंकि यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इतिहास पढऩे के लिए अंग्रेजों के लिखे इङ्क्षतहास को पढऩे के लिए मजबूर होते हैं इसलिए भारतीय समाज के इस महान नायक को हमने बिसरा दिया है। टीपू ने अपने साम्राज्य में पडऩे वाले श्रृंगेरी मठ को न सिर्फ नियमित आर्थिक मदद की वरन उस मठ के मठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद भारती जी महाराज से यह बादशाह नियमित मिला करता था और उनसे विमर्श भी किया करता था। इसके अलावा टीपू सुल्तान ने कभी हिंदू-मुसलमान का भेद नहीं किया और अगर उसने मस्जिदें बनवाईं तो मंदिरों को भी दिल खोलकर चंदा दिया। यही कारण था कि टीपू के दो विश्वस्त सलाहकार और मंत्री ब्राह्मण थे। पूर्निया और कृष्णराव नाम के अपने इन ब्राहमण मंत्रियों को टीपू काफी मान देता था। उसके अन्य तमाम सलाहकार भी हिंदू व फ्रांसीसी थे।
एक बार मालाबार तट के कुछ नायरों को कुछ पादरियों ने ईसाई बन जाने का लालच दिया। उन लोगों ने अपने सुल्तान टीपू से राय मांगी। इस विषय पर टीपू ने जो कहा वह उल्लेखनीय है। टीपू ने उन लोगों को कहा कि
“राजा प्रजा का पिता होता है। इसलिए मेरी आपको सलाह कि आप अपने पितृपुरुषों का मजहब यानी हिंदू मजहब पर कायम रहें। और यदि आपको अपना मजहब बदलने की इच्छा है तो आप ईसाई होने की जगह अपने पितृतुल्य राजा का मजहब स्वीकार कर लें।“
टीपू सुल्तान का जगत गुरु शंकराचार्य से संवाद चलता ही रहता था। उसने शंकराचार्य स्वामी सच्चिदानंद भारती को तीस के ऊपर पत्र लिखे और ये सारे पत्र मैसूर संग्रहालय में मौजूद हैं। ऐसा ही एक पत्र यहां दृष्टव्य है-
“कांग्रेस का घोर हिंदू विरोध ही उसे ले डूबा!”
मत् परमहंसादि यथोक्त श्रीविरुदांकित श्रृंगेरी श्री स्वामी सच्चिदानंद भारती जी महाराज की सेवा में टीपू सुल्तान बादशाह का सलाम।
श्री महाराज के लिखकर भेजे हुए पत्र से सकल अभिप्राय विदित हुआ। आप जगदगुरु हैं, सर्वलोक के क्षेम और सबकी स्वस्थता के लिए आप तपस्या करते रहते हैं। ऐसे ही दया कर इस सरकार के क्षेम उसकी उत्तरोतर अभिवृद्घि के लिए तीनों काल में तपस्या करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करने की कृपा कीजिए। आप जैसे महापुरुष जिस देश में निवास करते हैं, उस देश में वर्षा अच्छी होती है, कृषि फलती-फूलती है और सदा सुभिक्ष रहता है। आप इतने अधिक दिनों तक परदेश में क्यों रह रहे हैं? जिस उद्देश्य से श्रीमहाराज वहां गए हैं उसे शीघ्र अपने अनुकूल सिद्घ करके अपने स्थान पर वापस आने की कृपा कीजिए।
ता 29, महीना राजी साल शहर सन् 1220 महम्मदी, तदनुसार परीधावी संवत्सर माघ कृष्णा चतुर्दशी, लिखा हुआ सुब्राऊ मुंशी हुजर।
(यह पत्र टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी के शंकराचार्य को लिखा था जो कुछ काल के लिए कांची चले गए थे। मूल कन्नड़ में लिखे गए पत्र की प्रतिलिपि भी संलग्न है।)
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