किसके पक्ष में हैं गुजरात चुनाव के आंकड़े ? जानें - Khabar NonStop
अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान बस होने ही वाला है। लेकिन राज्य में चुनाव का माहौल काफी समय से बना हुआ है। सरसरी निगाह डालें तो पिछले 22 सालों से गुजरात पर राज कर रही भाजपा इस बार मुश्किल में दिखाई दे रही है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है ? ये जाननें के लिए आइए डालते हैं गुजरात चुनाव के आंकड़ों पर एक नजर-
क्या हैं जातिगत आंकड़े
पिछड़ा वर्ग वोटबैंक
भारत के किसी भी राज्य में होने वाले चुनावों में जातिगत आंकड़े बेहद अहम होते हैं। हम भले ही जाति व्यवस्था का विरोध करें, लेकिन यह बात माननी होगी कि भारत में चुनाव जातिगत आधार पर ही लड़े जाते हैं। अब गुजरात चुनावों पर लौटते हुए बता दें कि गुजरात में पिछड़ा वर्ग काफी प्रभावी है। राज्य में पिछड़े वर्ग करीब 140 जातियों में बंटा हुआ है। गुजरात में पिछड़ा वर्ग वोटबैंक कुल वोट प्रतिशत का 51 प्रतिशत है। इस तरह कह सकते हैं कि जिसने गुजरात में पिछड़ा वर्ग वोटबैंक को साध लिया, उसने लगभग आधी लड़ाई जीत ली।
अभी के हालात देखें तो अल्पेश ठाकोर गुजरात में पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं। गौरतलब है कि अल्पेश ठाकोर कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस का पलड़ा स्वाभाविक तौर पर भारी नजर आ रहा है।
पाटीदार वोटबैंक
गुजरात में पाटीदारों का काफी दबदबा है। वैसे तो पाटीदार भाजपा का परंपरागत वोटबैंक माने जाते रहे हैं। लेकिन इस बार स्थिति उल्टी है। दरअसल आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदार समुदाय भाजपा से छिटक गया है। यही कारण है कि इस बार गुजरात में भाजपा की हवा बहुत ही धीमी चल रही है। बता दें कि गुजरात में कुल वोट प्रतिशत का 14-15 प्रतिशत पाटीदारों का है। वहीं ऊंची और प्रभावशाली जाति होने के कारण कई और जातियों पर भी इसका प्रभाव है। हालांकि पाटीदारों में भी टूट के आसार दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि युवा पाटीदार जहां भाजपा की मुखालफत कर रहे हैं। वहीं बुजुर्ग अभी भी भाजपा से लगाव रखते हैं। ऐसे में अब देखने वाली बात होगी कि भाजपा अपने ढहते किले में सेंध लगा पाती है या फिर पाटीदार भी कांग्रेस के खेमें पहुंचेंगे ?
आदिवासी वोटबैंक
गुजरात में आदिवासी वोटबैंक की भी अच्छी खासी तादाद है। बता दें कि मध्य गुजरात की करीब 2 दर्जन सीटों पर आदिवासियों का बड़ा प्रभाव है। हालांकि आदिवासी परंपरागत रुप से कांग्रेस का वोटबैंक रहे हैं। लेकिन इस बार भाजपा आदिवासियों को रिझाने में लगी है। हाल ही में भाजपा ने आदिवासी गौरव यात्रा निकालकर आदिवासियों को अपने पाले में खींचने की कोशिश की है। इसके अलावा हाल ही में अपने गुजरात दौरे पर पीएम मोदी ने भी आदिवासी कल्याण के लिए कई अहम योजनाओं की घोषणा की थी। अब भाजपा की यह कोशिश क्या रंग लाती है, ये तो चुनावों के बाद ही पता चल सकेगा ? बता दें कि गुजरात में आदिवासी कुल वोटबैंक का करीब 15-16 प्रतिशत हैं।
दलित वोटबैंक
गुजरात में दलित ज्यादा प्रभावी स्थिति में नहीं हैं। बता दें कि गुजरात में कुल 8 प्रतिशत के करीब दलित जनाधार है। दलित जनता भी इस बार भाजपा का खुलकर विरोध कर रही है। दलितों के नेता जिग्नेश मेवानी भी भाजपा की मुखालफत कर रहे हैं और कांग्रेस से उनकी नजदीकी चर्चा में हैं। ऐसे में स्थितियां भाजपा के लिए बढ़ती मुश्किलों की ओर ही इशारा कर रही हैं।
भाजपा को हराना इतना भी आसान नहीं
गुजरात में भले ही समीकरण भाजपा को हाशिए पर धकेल रहे हों, लेकिन गुजरात की राजनीति को समझने वाले लोगों का मानना है कि भाजपा को गुजरात में हराना इतना भी आसान नहीं है। दरअसल भाजपा गुजरात में हिंदुत्व की वाहक रही है। यही कारण है कि हिंदुत्व के कारण भाजपा की सभी वर्गों में गहरी पैठ है। इसके साथ ही कांग्रेस की कोशिश है कि वह पाटीदारों, पिछड़ो और दलितों सभी को एक साथ ले आए। लेकिन कांग्रेस को इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। दरअसल पाटीदारों के आरक्षण का पिछड़ा वर्ग विरोध कर रहा है। ऐसे में दोनों का एक ही झंडे तले आना आसान नहीं होगा। वहीं दलितों का विरोध तो अगड़ी जातियों से ही रहा है। ऐसे में दलित कैसे पाटीदारों के साथ एकराय बना पाएंगे ? यही कारण है कि अभी तक पाटीदारों और दलितों ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान नहीं किया है।
ऐसे में अब देखने वाली बात होगा कि क्या कांग्रेस पिछड़ा वर्ग को अपने समर्थन में एकजुट रख पाती है या फिर भाजपा हिंदुत्व और जोड़-तोड़ की राजनीति के दम पर सभी वर्गों में सेंध लगाकर फिर से गुजरात में परचम लहराती है ?
from Latest News in Hindi http://ift.tt/2i2Y8FO
Comments
Post a Comment