यह दीवाली तो और ज्यादा भयानक काली होगी! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
पिछले साल की दिवाली काली थी लेकिन इस बार की और काली होने की आशंका है। भले यह कालिमा पटाखों के धुएं से न हो लेकिन सरकार ने जो हर छोटे-बड़े व्यापारी, नौकरीपेशा, किसान और कारखानेदारों का धुआँ निकाल रखा है, उससे तो अवश्य काली होगी। नोटबंदी से तो कालिमा फैली ही थी जीएसटी ने उसमें और इजाफा कर दिया। पिछले साल दीवाली के 9 दिन बाद 8 नवम्बर को केंद्र की मोदी सरकार ने एक तुगलकी फरमान ज़ारी कर हज़ार और 5 सौ के नोट बंद कर दिए। बहाना बनाया गया कि इस तरह सरकार काले धन पर रोक लगाएगी। लेकिन हज़ार के स्थान पर दो हज़ार का नोट आ गया और 5 सौ की जगह दूसरा छोटा-सा नया नोट। तब किसी को समझ नहीं आया कि इस तरह कैसे काला धन रुकेगा!
लगभग एक साल होने को आया मगर काला धन तो रुका नहीं उलटे वह सारा काला धन दो हज़ार के नए पिंक नोट आने से गुलाबी धन में परिवर्तित हो गया। सब ने अपने-अपने पुराने नोट ठिकाने भी लगा लिए। और नोटबंदी का लाभ भी भाजपा सरकार ने उठा लिया। उत्तर प्रदेश जैसे बहुरंगी स्टेट में उसने बहुमत से सवा सौ सीटें अधिक हासिल कर लीं। उस सूबे में इसके पहले तीन दशक में कोई भी पार्टी इतनी अधिक सीटें नहीं प्राप्त कर सकी थी। नोटबंदी से यकीनन गरीब आदमी खुश हुआ था। तब उसे लगा था कि अब सब आए उसकी जैसी स्थिति में। क्योंकि हज़ार और पांच सौ के नोटों की बंदी की मार मध्य वर्ग पर, इन बड़े नोटों से रिश्वत लेने वाले अफसरों, डाक्टरों और इंजीनियरों तथा पुलिसवालों के ऊपर सबसे ज्यादा पड़ी थी। इसके अलावा शिक्षा माफिया और निजी अस्पताल माफिया प्रभावित हुआ था। चूँकि इन लोगों से जनता सदैव त्रस्त रहती है इसलिए वह खुश हुई थी कि नोटबंदी का फैसला बेहतर है। मगर इन सब लोगों ने अपनी यह कमाई हज़ार से दो हज़ार कर ली। क्योंकि कुछ नोट बंद हुए तो कुछ उससे भी बड़े नोट बाज़ार में आ गए। कुछ दिन तो सबको परेशानी हुई लेकिन जल्द ही वे इससे निजात पा गए। अंतर यह आया की रिश्वत की मांग हज़ार की बजाय दो हज़ार में हो गई। यानी अब जो भी पैसा आएगा वह दो हज़ार के नोटों में आएगा।
‘राजनीति में इत्तेफाक नहीं होते’
8 नवंबर 2016 को रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक 500 और 1000 के नोटों को बंद कर देने की घोषणा कर दी थी। यह एक ऐतिहासिक घोषणा थी। दुनिया भर में यह मामला गूँज उठा था। इस फैसले की वजह से देश की 86 प्रतिशत मुद्रा एक ही झटके में चलन से बाहर हो गई। देश भर में जिसे देखो वही अपना कामधंधा छोड़कर हजार और पांच सौ के नोट बदलवाने के लिए बैंकों की लाइन में लग गया। प्रधानमंत्री ने अपने इस फैसले को भ्रष्टाचार, कालेधन, जाली नोट और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का निर्णायक युद्ध बताया तो वहीँ विरोधी इसे सरकार की बौखलाहट बताने लगे। पर यह सच है कि केंद्र सरकार के इस फैसले में हड़बड़ी खूब हुई। पहली बात तो नोट बदलवाने के लिए जो 50 दिन की समय सीमा दी गई उन 50 दिनों में सरकार और रिजर्व बैंक ने 75 अधिसूचनाएं और जारी करीं तथा 11 बार आदेश वापस लिए गए। इस दौरान रिजर्व बैंक का रुतबा कमजोर हुआ। नोटबंदी के लक्ष्य को लेकर भी यही दुविधा रही। इसके बाद मुख्य मुद्दा छोड़कर ‘कैशलेस अर्थव्यवस्था’ का लक्ष्य निर्धारित किया जाने लगा। इसकी एक वज़ह तो यह रही कि सरकार नई नकदी का इंतजाम ही नहीं कर सकी।
500 और 1000 के पुराने नोट बंद, सिर्फ कागज के टुकड़े हैं ये नोट
जिस देश में कैशलेस का मतलब घनघोर गरीबी होता हो वहां यह आधुनिक कैशलेस सिस्टम एक मज़ाक ही था जो सरकार ने किया था। एक ऐसे मुल्क में जहाँ साक्षरता दर 60 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो वहां के लोगों से कैशलेस की अपेक्षा एक किस्म की बदगुमानी ही है। यहाँ के समाज में कैशलेस का मतलब बार्टर सिस्टम है। अर्थात किसी सामान के बदले अनाज का अदन-प्रदान अथवा किसी अन्य सामान को देना। इसके अलावा लाखों परिवारों के पास तो अपना बैंक एकाउंट ही नहीं है, तब भला कैसे कैशलेस अर्थ व्यवस्था की कल्पना भारत जैसे देश में की जा सकती है।
ज़ाहिर है नोटबंदी एक निरर्थक कवायद ही साबित हुई है। छोटे, मंझोले लोग तो परेशान हुए ही उद्योग जगत भी परेशान है। इसका असर खरीददारी, उत्पादन और नौकरी तीनों पर पड़ा है। सर्राफा कारोबार, ऑटोमोबाइल, रिटेल कारोबार, इलेक्ट्रॉनिक्स के बड़े उद्योगों, प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन आदि पर खासा असर देखने को मिल रहा है। कई कंपनियों द्वारा घटती मांग के चलते उत्पादन में कटौती और कुछ दिनों के लिए प्लांट बंद किए जाने की भी ख़बरें आई हैं। नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जिसका देश की अर्थव्यवस्था में 45 प्रतिशत योगदान है और 80 प्रतिशत रोजगार भी इसी क्षेत्र में है। नगदी नहीं होने की वजह से यहां बड़ी संख्या में मजदूरों को या तो निकाला जा रहा है, या छुट्टी पर भेज दिया गया है। टेक्सटाइल सेक्टर में लगभग सत्तर लाख दिहाड़ी मजदूर काम करते हैं, जिसमें से बड़ी संख्या में मजदूर प्रभावित हुए हैं। इसी तरह से फिरोजाबाद की 90 प्रतिशत चूड़ी फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। ऐसे में यह दीवाली काली तो होनी ही है।
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