बीजेपी की फीकी पड़ती चमक! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनाने के बाद पहली बार ऐसा लगाने लगा है कि उनकी चमक फीकी पड़ने लगी है। उनके अपने ही सूबे गुजरात में लोग उनको नकार रहे हैं। जिस राज्य में वे लगातार तीन बार मुख्यमंत्री चुने गए और जहाँ उनका कोई विकल्प नहीं था आज उसी राज्य में उनके रोड शो में लोग नहीं जुट रहे। उधर कांग्रेस उन पर हमलावर है। राहुल गाँधी जिस तरह से उन पर निशाना साध रहे हैं उससे लगता है कि मोदी इस बार भंवर में फंसे हैं। गुजरात खाते-पीते लोगों का राज्य है। वहां का गरीब आदमी भी यूपी-बिहार के ‘भैयों’ की तरह यह नहीं सोचता कि मेरी एक आँख फूटती है तो फूटे पड़ोसी की दोनों फूट जाएं। इसीलिए नोटबंदी और जीएसटी का सबसे तीखा विरोध गुजरात में हुआ। लेकिन मीडिया गुजरात के इस विरोध की अनदेखी करता रहा। लेकिन कांग्रेस ने इस असंतोष को पढ़ लिया और उसने राहुल के ज़रिये इसी पर हिट कराया।
दूसरे नरेन भाई ने खुद को ज्यादा हिंदू दिखाने के लिए जिस तरह की नौटंकियाँ कीं उससे भी गुजराती हिंदू भद्र लोक चिढ़ा। इसी वज़ह से अब लगता है मोदी का जादू उतरने लगा है। अब न तो मोदी में और न ही उनके और गेरुआ नेताओं में वह दम-खम बचा है कि वे अब अपने बयानों और अपने टोटकों से भाजपा की चुनावी नैया पार करवा सकें। इसका सबसे पहला टेस्ट तो अभी गुजरात में ही होता दिख रहा है। जहाँ पर न तो मोदी के रोड शो में लोग आ रहे हैं न योगी के शो में। चूँकि नरेंद्र मोदी स्वयं गुजरात से हैं इसलिए गुजरात में पार्टी को झटके का मतलब है भाजपा की पतन-गाथा शुरू। एक कहावत है कि चाहे जितना शक्तिशाली व्यक्ति हो एक न एक दिन उसका विनाश अवश्य होता है और अपने पतन के कारण भी वह स्वयं बनाता है। भाजपा जिन हिंदू भावनाओं के रथ पर सवार होकर आई थी उनकी बेकद्री वह स्वयं कर रही है। इससे वही हिंदू जो मोदी को अपना नायक बताते थे अब मोदी के नाम से बिदकने लगे हैं।
पिछले दिनों प्रधानमन्त्री की केदारनाथ यात्रा में हिंदू आस्था का कतई ख्याल नहीं रखा गया और वहाँ जाकर उन्होंने हिंदू आस्थाओं का मज़ाक उड़ाया। केदारनाथ एक तीर्थ है और पूरे विश्व के हिंदुओं की आस्था का केंद्र भी। वहां प्रधानमन्त्री सूटेड-बूटेड गए और काला चश्मा पहन कर फोटो खिंचाई और मीडिया में प्रचारित भी करवाई। क्या एक मन्दिर में खुद को हिंदू-ह्रदय सम्राट कहने वाले व्यक्ति का इस बाने में जाना उचित है, यह प्रधानमंत्री ने नहीं सोचा। मन्दिर में प्रवेश के पूर्व मोदीजी यदि धोती पहन लेते तो उनका कुछ घट न जाता लेकिन वे तो मानों हेलीकाप्टर पर सवार होकर वहां पिकनिक मनाने गए थे। अभी चार वर्ष पहले केदारनाथ में जो हादसा हुआ था, उसके पीछे जो कारण बताए गए थे उनमें एक यह भी था कि लोगों ने इस तीर्थ को पर्यटन स्थल बना दिया है। मगर अब तो स्वयं भाजपा के प्रधानमन्त्री केदारनाथ का बाजारीकरण करने में जुटे हैं। उनकी ऐसी कवायद कहीं न कहीं उनकी पराजय-गाथा भी लिख रही है।
‘राजनीति में इत्तेफाक नहीं होते’
इसी तरह दीवाली की पूर्वसंध्या पर अयोध्या में जो कुछ हुआ, वह और शर्मनाक था। अयोध्या में सरयू तट पर तमाशबीनों का मेला लगा। लाखों दिये तिल के तेल से जलाए गए, उनकी महक और उनकी आंच भाजपा को भले भायी हो लेकिन आम हिंदू लोगों को नहीं भायी। यह क्या नौटंकी है कि राम और सीता तथा लक्ष्मण के वेश में कुछ कलाकार हेलीकाप्टर से सरयू तट पर उतारे गए और मुख्यमंत्री ने उनके पैर छुए। इससे क्या सन्देश गया कि उन अभिनेताओं की तरह मुख्यमंत्री भी एक अभिनेता है! अगर इन सब उपायों से लोग जुड़ते और वोट दिया करते तो आखिर क्यों गुजरात में योगी आदित्यनाथ के रोड शो में भीड़ नहीं जुटी, जबकि गुजरात में गोरख मत के अनुयायी ही इतने अधिक हैं कि अकेले उन्हीं के जुट जाने से खासा मेला लग गया होता।
लोग जानते हैं कि वोट चाहने वाला धर्म का इस्तेमाल करता है फिर वे चाहे योगी हों या मोदी हों। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जो बढ़त मिली थी उसकी मुख्य वज़ह थी कांग्रेस के पास आक्रामक नेतृत्त्व का अभाव और मीडिया में उसके भ्रष्टाचार का खूब प्रचार। लेकिन अब भाजपा की नकारत्मकता है और उससे भी ज्यादा उसका हिंदू आस्था का मज़ाक उड़ाना भी एक अहम मुद्दा बन गया है। और यही भाजपा को भारी पड़ेगा।
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