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‘कांग्रेस को ख़त्म करना ही बेहतर था’ - Khabar NonStop

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शंभूनाथ शुक्ल

उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अधिवेशन गुरुवार 12 अक्टूबर को लखनऊ में हो गया. इस अधिवेशन में तीन बातें ख़ास रहीं. एक कि राहुल गाँधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाए, दो कि यूपी कांग्रेस के लिए अध्यक्ष का चुनाव हो और तीसरा प्रस्ताव पास हुआ कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के लिए उत्तर प्रदेश से नामों का चयन किया जाए. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के इन तीनों ही प्रस्तावों में गज़ब का विरोधाभास और हद दर्जे की चापलूसी है. जहाँ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए वे किसी भी तरह के चुनाव और नियमों की परवाह नहीं कर रहे हैं वहीँ प्रांतीय अध्यक्ष के लिए वे किसी भी नाम का प्रस्ताव नहीं पास कर रहे. इसी तरह जब तक नई एआईसीसी ही न बन सकी हो तब तक अध्यक्ष के नाम के तौर पर राहुल गाँधी का प्रस्ताव उन्होंने कैसे पास कर दिया? और सबसे अहम सवाल तो यह है कि जिस निर्वाचित और चयनित प्रांतीय कांग्रेस का इसे प्रथम अधिवेशन बताया गया, उसकी सूची क्यों नहीं ज़ाहिर की गई. इससे पता चलता है कि 132 साल पुरानी इस कांग्रेस में लोकतंत्र अभी तक नहीं आया है. एक तरह से कांग्रेस की यह हरकत ‘चुकरिया में गुर फोरना’ हुआ. ‘चुकरिया में गुर फोरना’ एक अवधी कहावत है जिसका अर्थ होता है आपस में मिलकर स्वार्थसिद्धि कर लेना.

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मालूम हो कि गाँधी जी ने आज़ादी के तत्काल बाद ही कहा था कि कांग्रेस को अब भंग कर देना चाहिए क्योंकि इसका मकसद पूरा हो गया है. अब आगे अगर यह पार्टी रही तो इसमें सिर्फ चापलूस ही बचेंगे. गाँधी जी का यह आकलन कितना सही था, इसका अंदाजा आज की कांग्रेस को देख कर हो जाता है. यहाँ सिर्फ चापलूस बचे हैं जिन्होंने परिवारवाद, नस्लवाद और जातिवाद को ही मजबूत बनाया है. हालात इतने बदतर हो गए हैं कि जो भी इस पार्टी में आता है वही वंशवाद, परिवारवाद के गुण गाने लगता है. यहाँ जो कुछ है परिवार है. और परिवार के हितों की रक्षा करना ही इस पार्टी का अकेला मकसद है. यही कारण है कि आज यह पार्टी धीरे-धीरे रसातल में समाती जा रही है. पार्टी के अंदर न कोई शीर्ष नेतृत्त्व बचा है न जिले और कस्बे में इसकी जड़ें. एक तरह से कहा जाए तो आज इस पार्टी के सारे नेता बस राहुल और सोनिया की गणेश परिक्रमा किया करते हैं. ऐसी पार्टी से जनता भला उम्मीद भी करे तो क्या!

ये वही कांग्रेसी नेता हैं जो सपा और बसपा में किसी भी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं होने का रोना रोते हैं. जिनका कहना है कि भाजपा सिवाय हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं करती. लेकिन अगर सपा-बसपा और भाजपा गड़बड़ हैं तो आप ही क्या कर रहे हैं. क्यों नहीं आप अपनी पार्टी का विस्तार करते, उसे गाँव-कस्बे और ज़िला स्तर पर ले जाते. पुराने कार्यकर्त्ताओं के अंदर उत्साह को बढ़ाते हैं. कांग्रेस के आला नेतृत्त्व ने इस पार्टी को चापलूसी और निज स्वार्थों की पूर्ति तक सीमित कर दिया है. अगर कांग्रेस ने अपने को नहीं सुधारा और जनता के बीच नहीं गई तो कांग्रेस किस बिना पर अपने वजूद को बचाए रख पाएगी?

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सत्य तो यह है कि आज जो भी हम कांग्रेस का प्रचार देखते हैं वह आभासी प्रचार है. केंद्र में बैठी भाजपा से लड़ने के लिए वामपंथी और लिबरल लोग उसका प्रचार कर रहे हैं. लेकिन आभासी प्रचार से कोई पार्टी जनता के बीच मज़बूत नहीं हो पाती. जनता के बीच पहुँचने के लिए उसे अपने कार्यकर्त्ताओं के बूते ही मजबूत होना पड़ेगा. इसके लिए पार्टी को अपने नेताओं की निरंकुशता से नहीं अपने आंतरिक लोकतंत्र से खड़ा होना पड़ेगा. दुःख इसी बात का है कि कांग्रेस लोकतंत्र को खो चुकी है. ऐसी स्थिति में इसे नष्ट होने से कोई रोक नहीं सकता.



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