सबसे बड़ा धर्मान्तरण अम्बेडकर ने कराया था! - Khabar NonStop
B R Ambedkar
शंभूनाथ शुक्ल
भगवान बुद्ध से उनके प्रिय शिष्य आनंद ने एक बार पूछा कि भगवान यदि मार्ग कंटकाकीर्ण (काँटों से भरा) हो और उस मार्ग से गुजरना जरूरी तो क्या करना चाहिए। भगवान बुद्ध ने जवाब दिया कि दो उपाय हैं आनंद। या तो उन काँटों को एक-एक कर हटाते हुए रास्ता पूरा करे मगर इसमें समय बहुत लगेगा। दूसरा उपाय है कि जूता पहनकर उन काँटों के ऊपर से निकल जाया जाए। डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने यही दूसरा रास्ता अपनाया क्योंकि पहला रास्ता चलते-चलते उन्होंने 65 वर्ष गुजार दिए और वे उस कंटकाकीर्ण मार्ग से कांटे नहीं हटा सके। इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाने की सोची। वह रास्ता था परम्परागत हिंदू धर्म का त्याग। आज से 61 वर्ष पहले 14 अक्टूबर को डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने हिंदू धर्म छोड़कर अपने पांच लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था।
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नागपुर में उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु महत्थ्बीर चन्द्रमणि से त्रिरत्न ग्रहण किया और पंचशील को अपनाया। उस दिन पहली बार उन्होंने कहा कि वे अपने जन्म के बाद से लगातार इस प्रयास में रहे कि हिंदू समाज के लोग अपने को सुधारें तथा गैर बराबरी को समाप्त करें। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ क्योंकि हिंदू धर्म की बुनियाद ही गैर बराबरी पर रखी है। अम्बेडकर ने दीक्षाभूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं जो बौद्ध धर्म का एक सार या दर्शन हैं। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर द्वारा 10,00,000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। भीमराव की ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है। ये प्रतिज्ञाएं बौद्ध धर्म का एक अंग है जिसमें पंचशील, मध्यममार्ग, अनिरीश्वरवाद, दस पारमिता, बुद्ध-धम्म-संघ ये त्रिरत्न, प्रज्ञा-शील-करूणा-समता आदी बौद्ध तत्व, मानवी मुल्य (मानवता) एवं विज्ञानवाद है।
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1948 से ही डाक्टर अम्बेडकर मधुमेह रोग से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि “बुद्ध और उनके धम्म” को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर का महा परिनिर्वाण दिल्ली में उनके घर मे हो गया। 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। उनके अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब 10,00,000 अनुयायीओं ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, ऐसा विश्व इतिहास में पहिली बार हुआ था।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। तथा दलित बौद्ध आंदोलन में भीमराव के बाद (भीमराव के साथ) बौद्ध बनने वाली वह पहिली व्यक्ति थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम डॉ॰ शारदा कबीर था। डॉ॰ सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई।
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