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‘सत्ता के शीर्ष पर राजनीति से सन्यास लेने वाला एकमात्र राजनेता’ - Khabar NonStop

Nanaji Deshmukh

नई दिल्ली। आज भाजपा के वरिष्ठ नेता और पितृ-पुरुष नानाजी देशमुख की जयंती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा के उदय में उनके योगदान को याद किया। लेकिन भाजपा को खड़ा करने के अलावा नानाजी देशमुख एक और बात के लिए जाने जाते हैं। बता दें कि नानाजी देशमुख इकलौते ऐसे नेता हैं, जो सत्ता के शीर्ष पर सन्यास लेकर समाज सेवा में लग गए थे।

कौन थे नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के कडोली में 11 अक्टूबर 1916 को हुआ था। लोकमान्य तिलक की राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होकर नानाजी सन् 1940 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। इसके बाद जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी राजनैतिक शाखा जनसंघ बनायी तो उसमें शामिल होने वाले नानाजी देशमुख शुरुआती व्यक्ति थे।

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नानाजी देशमुख जैसे लोगों के ही अथक प्रयासों का नतीजा था कि जनसंघ बहुत जल्द ही अपनी जडे जमाने में कामयाब रहा। आज जो हम भाजपा को देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जानते हैं, उसे खड़ा करने में नानाजी देशमुख का बहुत बड़ा हाथ है। नानाजी देशमुख बड़े ही कुशल रणनीतिकार माने जाते थे।

Nanaji Deshmukh

लोकनारायण जयप्रकाश के लिए खायी लाठियां

आज जब राजनीतिक फायदे के लिए दोस्त भी दुश्मन हो जाते हैं, वहीं नानाजी देशमुख राजनीतिक विचारधारा के इतने पक्के धुनी थे कि जब लोकनारायण जयप्रकाश इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे, तो उनके लिए नानाजी देशमुख ने लाठियां खायी थी। दरअसल पटना में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज कर दिया। चूंकि प्रदर्शन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण कर रहे थे, तो पुलिस ने उन पर भी लाठियां भांजना शुरु कर दिया। लेकिन जयप्रकाश नारायण को बचाने के लिए नानाजी देशमुख उनके ऊपर लेट गए और खुद लाठियां खाकर जयप्रकाश नारायण को बचाया। ऐसी थी नानाजी देशमुख की राजनीतिक विचारधारा की धुन।

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सत्ता के शीर्ष पर लिया सन्यास

वहीं आज के समय में जहां 70-80 साल तक भी सत्ता का मोह नहीं छोड़ पाते, वहीं नानाजी देशमुख ने सत्ता के शीर्ष पर राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी थी। बता दें कि जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो नानाजी, जिन्होंने जनसंघ को खड़ा करने में अहम भूमिका निभायी थी, उन्होंने राजनीति से सन्यास की घोषणा कर सभी को चौंका दिया था।

इसके बाद नानाजी चित्रकूट चले गए, लेकिन वहां भी उन्होंने समाज सेवा से नाता बनाए रखा। इसी दौरान नानाजी देशमुख ने सरस्वती शिशु मंदिर नामक स्कूल की नींव रखी। इसके अलावा चित्रकूट में दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक सदस्य रहे।



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