आशिक़ का जनाज़ा धूम से निकले! - Khabar NonStop
शम्भूनाथ शुक्ल
उर्दू में ऐसे बहुत से शेर हैं जिनका केवल एक मिसरा ही मशहूर है जैसे “आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले” जबकि पूरा शेर मिर्जा माहेम्मद अली “फिदवी” का है “चल साथ के हसरत दिले महरूम से निकले, आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले।” अक्सर इश्क में फसे हुए लोगों को कहा जाता है कि “कहते है जिसको इश्क खलल है दिमाग का” जबकि पूरा शेर इस प्रकार है “बुलबुल के कारोबार पे है खंदाहाए गुल, कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।”
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उर्दू के महानतम कवियों में से गा़लिब के बहुत से मिसरे लोगों को याद हैं तथा समय समय पर उनका प्रयोग किया जाता है। पूरे शेर तो एक तरफ शायद लोग यह भी नहीं जानते कि वह मिसरे गालिब के हैं जिन्हें वह अपने विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहे हैं जैसे नीचे प्रचलित मिसरे कोष्टों में दिये गये हैं तथा अप्रचलित कोष्टहीन दिये गये हैं।
“खुलता किसी पे क्यों मेरे दिल का मुआमला
(शेरों के इन्तिखाब ने रूसवा किया मुझे)
“ग़मे हस्ती का “असद” किस से हो जुज़ मर्ग इलाज,
(शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक)
काबा किस मुँह से जाओगे ‘गा़लिब’
(शर्म तुम को मगर नहीं आती)
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
(दिल के खुश करने को, ‘गालिब’ यह खयाल अच्छा है)
जिन्दगी अपनी जो इस ढंग से गुजरी ‘गालिब’
(हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे)
इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना,
(दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना)
किसी बीमार मित्र को तत्काल यही सुझाव दिया जाता है कि भाई अपना इलाज कराओ क्योंकि ‘‘जान है तो जहान है प्यारे’’ लेकिन यह मिसरा मीर का है जिसे उन्होंने अपने इस शेर में कहा था कि
‘‘मीर’’ अमदन भी कोई मरता है,
(जान है तो जहान है प्यारे)
इसी तरह मिसरा ‘‘जिन्दगी जिन्दा दिली का नाम है’’ ‘‘नासिख’’ के शेर का अंग है
जिन्दगी जिन्दा दिली का नाम है
(मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं)
सबसे बड़ा धर्मान्तरण अम्बेडकर ने कराया था!
अक्सर लोग कहा करते हैं ‘‘हजरते दाग जहॉ बैठ गये बैठ गये,’’ पर यह शेर ‘‘मिर्जा दाग’’ का है
जिन्होंने कहा था कि
‘‘हजरते दाग जहॉ बैठ गये, बैठ गये
(और होंगे तेरी महफिल से उभरने वाले)
परिचय होने पर अक्सर कहा जाता है ‘‘और खुल जायेंगे दो चार मुलाकातों में’’ यह मिसरा गा़लिब ‘असद’ ने इस प्रकार कहा था।
“राह पे उनको लगा लाये तो हैं बातों में,
और खुल जायेंगे दो चार मुलाकातों में।”
‘‘बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा, मिसरा शेफता के उस शेर का अंग है
“हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम,
बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा।”
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कहा जाता है ‘‘जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे’’ यह मिसरा साकिब के इस शेर का हिस्सा है
‘‘बागबाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे,
(जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे)
साकिब का एक और शेर भी आपने अक्सर सुना होगा।
“ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था,
हमी सो गये दास्तां कहते-कहते।”
‘‘तुझको पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू’’ मिसरा जौ़क के पूरे शेर में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया था।
‘‘रिन्दे खराब हाल को जाहिद न छेड़ तू,
(तुझको पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू)
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कई बार लोग कहते हैं, “नही मोहताज जेवर का जिसे खूबी खुदा ने दी।” इस शेर को नजमुद्दीन आबरू ने इस तरह कहा था-
‘‘नही मोहताज जेवर का जिसे खूबी खुदा ने दी,
(कि उसको बदनुमा लगता है जैसे चाँद को गहना)
लोग कहा करते हैं ‘‘राजी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रजा़ है’’ कहने वाले को क्या मालूम कि अल्लामा डॉक्टर सर इकबाल ने यह बात तो भगवान से कही थी
‘‘शिकवा न बेशो कम का तकदीर का गिला क्या
(राजी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रजा़ है)
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‘‘हसरत उन गुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गये’’ मिसरा पंडित ब्रज नारायण चकबस्त के इस शेर का हिस्सा है
‘‘खिल के गुल कुछ तो बहारे जॉ फिजा दिखला गये,
(हसरत उन गुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गये)
इसी तरह ‘‘ज़वान-ए-खल्क को नक्कारा-ए-खुदा समझो’’ मिसरा जौक़ के उस शेर का है
‘‘बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो,
(जुवान-ए-खल्क को नक्कारा-ए-खुदा समझो)
किसी के मरने पर अक्सर मुँह से यह निकल जाता है ‘‘खुदा बख्शे बहुत सी खूबियाँ थी मरने वाले में’’ हालांकि दाग ने अपनी प्रेमिका के दुर्व्यवहार से दुखी होकर अपनी काल्पनिक मृत्यु के सन्दर्भ में इसे यू कहा था
‘‘खबर सुन कर मेरे मरने की वो बोले रकीबों से ,
(खुदा बख्शे बहुत सी खूबियाँ थी मरने वाले में)
अक्सर कहा जाता है ‘‘हर शाख पे उल्लू बैठा है अन्जाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा’’ यह मिसरा इस शेर का भाग है
‘‘बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है,
(हर शाख पे उल्लू बैठा है अन्जाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा)
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एक और मिसरे में कहा जाता है ‘‘समझ हर एक राज़ को मगर फरेब खाए जा’’ यह मिसरा इस शेर का भाग है
‘‘फुगां की मुझ गरी पर हयात का ये हुक्म है,
(समझ हर एक राज़ को मगर फरेब खाए जा)
किसी कार्यक्रम के अन्त में दर्शकों से अक्सर कहा जाता है ‘‘अब हो चुकी नमाज़ मुसल्ला उठाइये’’ यह मिसरा नासिख के उस शेर का है जिसे उन्होंने इस प्रकार कहा था-
‘‘फस्ले बहार आई पियो सूफियो शराब,
(अब हो चुकी नमाज़ मुसल्ला उठाइये)
लेखक- अनिल माहेश्वरी
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