दीवाली के दिये की तरह रौशनी करो! - Khabar NonStop
शंभूनाथ शुक्ल
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। किसी भी उम्र में आप सीख सकते हैं। इसके लिए बस लगन चाहिए। बचपन से ही अपने पास टेबल कुर्सी कभी नहीं रही पर लिखता बहुत था। एक काठ की बकसिया के ऊपर कागज रखता और चालू हो जाता। रोजाना एक या दो लेख तो लिखता ही। फिर जब संपादक हो गया तो स्टेनो मिल गया और कलम बंद। बोला और लिखा दिया। कंप्यूटर का युग आया तो उसके की बोर्ड को चलाना तक नहीं सीखा आखिर अपने पास पीए जो था। लेकिन जब चंडीगढ़, कोलकाता और कानपुर में संपादकी करने के बाद दोबारा दिल्ली आया तब पीए नहीं दिया गया। मैने तब के अपने प्रधान संपादक से कहा कि मुझे पीए दिया जाए वर्ना मैं लिखूंगा कहां से? उन्होंने कहा कि शुक्ला जी यहां पीए सिर्फ प्रधान संपादक को ही मिलता है। देखिए किसी भी अन्य संपादक के पास नहीं है। तब उस अख़बार के कारपोरेट आफिस में मेरे अलावा दो और लोग संपादक थे। वे दोनों ही कंप्यूटर के की बोर्ड पर काम कर लेते थे। मैने उनमें से एक से कहा कि मुझे भी कम्प्यूटर चलाना सिखा दीजिए। उन्होंने मुझे एक कागज पर बना हुआ की बोर्ड दे दिया जिसे मैने अपने डेस्कटॉप पर चिपका दिया और तीसरे ही दिन उनको खुद टाइप किया हुआ लेख दे दिया। रेमिंग्टन पर टाइप करने में मैं निष्णात हो गया। और इसके बाद तो धुंआधार चालू हो गया।
यह दीवाली तो और ज्यादा भयानक काली होगी!
अख़बार से रिटायरमेंट के बाद जब मैं डिजिटल संसार में आया और मुझे khabarnonstop का प्रधान सम्पादक बनाया गया तब एक दिन हमारे निदेशक श्री सऊद सलीम मेरे घर आए और एक नया कम्प्यूटर दे गए। यह विंडो-10 था और उस पर चाणक्य में टाइप करने की सुविधा नहीं थी। मैंने दूसरे निदेशक आशीष गुप्ता से अपनी समस्या बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि अंकल जी आप इतना लिखते हैं तो सीधे यूनीकोड में लिखा करिए इससे जो आप चाणक्य में लिखकर कनवर्ट करते हैं उसका झंझट खत्म और फिर सीधे साईट पर डाल दीजिए। मैंने पूछा- कैसे तो उन्होंने वह समस्या हल कर दी। कुछ दिन तो मैं प्रूफ की गलतियों से परेशान रहा लेकिन फिर सब ठीक। अब मैं इतना तेज़ स्पीड से और इतना ज्यादा लिख लेता हूँ कि मेरे एक मित्र संजय सिंह कहते हैं कि शंभू जी लोग तो बैल को आमंत्रित करते हैं आप तो सीधे-सीधे सांड़ों को लाल कपड़ा दिखा देते हो। मैंने तय कर लिया है मैं लिखूंगा और सत्य को उजागर करता रहूँगा। भले मेरे लेख से चाहे सांड़ भड़के या बैल अथवा गाय!
पर आप इतना समझ लो कि समझने और सीखने की मेरी क्षमता जबर्दस्त है। मैने 53 साल में बाइक चलानी सीखी और 57 में कार चलाना। इतनी तेज चला लेता हूं कि शायद ही यमुना एक्सप्रेस वे और उसके आगे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे पर मेरे से आगे कोई निकल पाता हो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती और उत्साह जीवन में कभी मरता नहीं है। जिसका उत्साह मर गया वो समझो वो मरा हुआ ही पैदा हुआ। इसलिए दीवाली पर मेरी यही शुभकामनाएँ हैं कि मित्रों अपना उत्साह बनाए रखो। यही दीवाली की दुआ है और यही दीवाली का दिया है। आगे बढ़ो, निरंतर दिए की तरह रौशनी करो! मत संकोच करो कि हाय अब उम्र नहीं रही। उम्र खूब है बशर्ते आप उसकी उपयोगिता समझो!
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