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पत्रकारिता गिरी या पत्रकार! - Khabar NonStop

Journalism

(एक चर्चा संजय की किताब के बहाने)

शंभूनाथ शुक्ल

संजय कुमार सिंह ने अस्सी के दशक में पत्रकारिता को ही अपने जीवन का आधार बनाने की ठानी। तब के बिहार में जमशेदपुर एक सपने दिखाने वाला शहर था। टाटा समूह की की इस उपनगरी में गेट के काफी दूर से ही लाल-लाल चिंगारियों से चमकता पहाड़ दिखता और इतना सुहाना लगता कि हर किसी के अंदर यह तमन्ना जगती कि इस पहाड़ पर चढ़ा जाए और शिखर से नीचे देखा जाए। संजय ने बी.एससी करने की बाद इस शिखर पर चढ़ जाने का मन बनाया। लेकिन गरम लोहे पर चढ़ना आसान नहीं होता। बार-बार उसकी तपन से घबरा कर वे नीचे आते और फिर चढ़ते, और फिर चढ़ते। संजय की यह दृढ़ इच्छा शक्ति उन्हें पत्रकारिता में ले आई। घर वाले भौंचक! किसी ने पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं सुना था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह बिगडैल लड़का पत्रकारिता करे तो ठीक मगर बस कुछ किस्से-कहानियाँ ही लिखे और रोजी-रोटी के लिए इंजीनियर बन जाए। लेकिन यह वह दौर था जब पत्रकारिता में कैरियर नहीं था। तब जब भी कोई लड़का पत्रकार बनता तो उसके जानने-पहचानने वाले पूछा करते कि तू पत्रकार है तो ठीक लेकिन तेरा खाना-खर्चा कैसे चलता है?

“कांग्रेस का घोर हिंदू विरोध ही उसे ले डूबा!”

संजय ने अपने इन्हीं अनुभवों पर एक पुस्तक लिखी है जो आजकल चर्चा में है। मगर आज तीस साल बाद संजय का मानना है कि जवानी के जोश में उन्होंने गलत पेशा चुन लिया। वे लिखते हैं- “जब मैं पत्रकारिता में आया उस समय तक पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं होती थी और माना जाता था कि लिखने पढ़ने के गुण ईश्वर प्रदत्त होते हैं और इसे सीखा-सिखाया नहीं जा सकता है। इसीलिए मैं पढ़ाई पर बहुत खर्च नहीं करने के बावजूद खुद को विशेष योग्यता वाला मानता था और उम्मीद करता था कि इस योग्यता को भी वही इज्जत मिलेगी जो लोग पढ़ लिखकर प्राप्त करते हैं। रही-सही कसर मेरे उन प्रशंसकों ने पूरी कर दी जो मेरे लिखे से प्रभावित होकर मेरे घर आते थे और मुझे लिखते रहने के लिए कहते थे और यह भी कि मुझे इसी लाइन में जाना चाहिए। आज अगर मैं अफसोस करता हूं कि मैंने गलत पेशा चुन लिया तो उन लोगों पर भी गुस्सा आता था जिन्हें इस पेशे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी फिर भी इसकी सिफारिश करते नहीं अघाते थे।”

सबसे बड़ा धर्मान्तरण अम्बेडकर ने कराया था!

“मेरे पिताजी टाटा समूह की ट्रक, रेलवे इंजन और एक्सकवेटर बनाने वाली कंपनी, टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड (अब टाटा मोटर्स) के जमशेदपुर (अब झारखंड, पहले बिहार) के प्लांट में नौकरी करते थे और मैंने जमशेदपुर में कंपनी की कॉलोनी और घर में ही होश संभाला और वहीं बड़ा हुआ। मुझे कभी भी नहीं लगा कि टाटा के इस कारखाने (अब टाटा मोटर्स) में नौकरी करने वालों को वेतन, भत्तों और सुविधाओं से कोई शिकायत थी। हां, बोनस को लेकर हर साल थोड़ी गर्मा-गर्मी होती थी और दुर्गापूजा के आस-पास मिलने वाले इस एक तरह के खजाने में कितना मिलना चाहिए इस पर कोई गंभीर विवाद कभी नहीं हुआ। मेरे होश में (लगभग 20 साल) 20,000 मजदूरों के इस प्लांट में कभी हड़ताल नहीं हुई।”

बीजेपी की फीकी पड़ती चमक!

“इसके बावजूद इस कारखाने की नौकरी में मेरी दिलचस्पी नहीं जगी और बड़े शहर का आकर्षण बना रहा। पत्रकारिता के अपने फायदे हैं, अच्छाइयां हैं और अगर आप सिर्फ अखबार पढ़कर रिपोर्टर की भूमिका को जानते हैं तो निश्चित रूप से वह अच्छा लगेगा। मशीन चलाना और पढ़ने लिखने की नौकरी करना वैसे भी अलग है। उन्हीं दिनों जमशेदपुर से हिन्दी में एक नया दैनिक शुरू हुआ। यह एक बड़ी बात थी। उसका आकर्षण गजब का रहा और उसमें लिखना शुरू कर दिया। लिखावट अच्छी थी और साफ-साफ लिखकर भेजता था इसलिए छपने भी लगा। एक दिन मुझे वहां नौकरी भी मिल गई। मैंने नोट किया कि सारी खबरें अंग्रेजी में थीं और खबर बनाना मतलब अंग्रेजी से अनुवाद करना और शीर्षक लगाना था। पता चला कि अखबार में छपने वाली तकरीबन सारी खबरें (लोकल रिपोर्टिंग छोड़कर) उस समय अंग्रेजी में आती थीं जिन्हें डेस्क के लोग मुख्य रूप से हिन्दी में अनुवाद करके शीर्षक आदि लगाकर खबर बनाते थे। मुझे यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि अंग्रेजी में आई खबरें हिन्दी के पाठकों के लिए अनुवाद की जाती हैं और फिर उन्हें हिन्दी में छापकर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जाता है।”

हिंदू-मुस्लिम के डर से ऊपर थे बापू!

यह उस वक़्त के पत्रकारिता की सूरत है. जब कम्प्यूटर नहीं था। इंटरनेट नहीं था और न ही टीवी मीडिया था। छोटे शहरों से डाक के जरिए ख़बरें आतीं थीं और बड़े शहरों तथा शेष दुनिया की ख़बरें न्यूज़ एजेंसीज से आतीं। ये एजेंसियां अंग्रेजी में ही ख़बरें भेजती थीं और सम्पादकीय विभाग के लोग इन्हें अनुवाद कर अपने अखबार में छापते। तब सम्पादकीय विभाग में काम करने वाले पत्रकारों को वेतन भी बहुत कम मिलता था लेकिन उनके अंदर जुनून रहता था क्योंकि समाज में वे सम्मानित थे। आम जनता हो या राजनेता अखबार में लिखी हर बात पर आँख मूंदकर यकीन करते थे। मगर आज इस पेशे में पैसा तो थोड़ा बढ़ा भी है पर अन्य पेशों के मुकाबले सिफर। इसके अलावा आज पत्रकारों की प्रतिष्ठा भी घटी है इसीलिए पूर्व सेना प्रमुख और फ़िलहाल केंद्र में मंत्री वीके सिंह ने पत्रकारिता को प्रेस्टीच्यूट तक कह दिया।

पत्रकार को “प्रेस्टीच्यूट” क्यों कहा जाता है!

संजय इस पुस्तक के अंत में जो उपसंहार करते हुए लिखते हैं- “मेरा मानना है कि पत्रकारिता आज स्थायी और सम्मानजनक पेशा नहीं है. मेरे जैसों के लिए तो बिल्कुल नहीं। आम बोलचाल में पत्रकार यानी संवाददाता या रिपोर्टर। ज्यादातर रिपोर्टर अंशकालिक होते हैं। जो पूर्णकालिक हैं उन्हें भी इतने कम पैसे में रखा जाता है कि अंधों में से काना चुनने जैसा काम है। और फिर ये अयोग्य लोग पत्रकार होने के नाम पर तीसमारखां बन जाते हैं तो दूसरे योग्य लोगों को प्रभावित करते हैं कि मैं तो उससे योग्य हूं, मैं अच्छा कर सकूंगा और इसी गलतफहमी से मीडिया संस्थाओं का काम चल रहा है। आप देखेंगे कि ऊपर के पदों के लिए रिक्तियां कम निकलती हैं पर नीचे के पदों पर लगभग हर साल नए लोग रखे जाते हैं। शुरू में इन लोगों को पत्रकारिता या कुछ नया करने का जोश रहता है और ये क्रांति के इंतजार में रहते हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं की उम्र निकलने के बाद नियमित इनक्रीमेंट लगते-लगते इनकी तनख्वाह जरूरत और अनुभव के हिसाब से भले ही ज्यादा नहीं होती है पर बहुत कम पैसे में वैसा ही काम करने वाले लोग आसानी से उपलब्ध रहते हैं। जो गुणवत्ता और लाभ अनुभवी लोग दे सकते हैं उसकी जरूरत ही नहीं है। इसलिए, संस्थान को पुराने लोग महंगे लगने लगते हैं और वह इनसे पीछा छुड़ाने की तरकीब सोचने लगता है। ऐसा अन्य व्यवसायों में भी होता है पर मीडिया में चूंकि गुणवत्ता की जरूरत लगभग है ही नहीं इसलिए यहां यह समस्या कुछ ज्यादा है।”

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