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अब राहुल को द्वारिकाधीश मन्दिर में प्रवेश क्यों! - Khabar NonStop

Dwarkadhish Temple dwarka

शंभूनाथ शुक्ल

साल 2011 की 23 जनवरी को मेरा द्वारिका पीठ में जाना हुआ। रात अहमदाबाद से सौराष्ट्र एक्सप्रेस पकड़ कर जब मैं द्वारिका पहुंचा तब तक दोपहर ढल चुकी थी। शाम तक तैयार होकर मैं द्वारिकाधीश के मन्दिर में गया। उस समय वहां बहुत भीड़ थी। लाइन लगाने के बाद करीब एक घंटे में मेरा नम्बर तो आ गया लेकिन द्वारिकाधीश की प्रतिमा के दर्शन के लिए समय बहुत कम मिला। ऊपर से पुजारियों की आपाधापी और बार-बार तुलादान कराने के आग्रह से मैं खीझ गया और लौट आया। अगले दिन सुबह मैं यूँ ही टहलने के वास्ते गेस्ट हाउस से निकला और सड़क पर बढ़ने करने लगा। आधा घंटे बाद मुझे लगा कि अरे, मैं तो द्वारिकाधीश मन्दिर के सामने खड़ा हूँ। हुलस कर मैं मन्दिर के अंदर प्रवेश कर गया। और जहाँ जूता उतारने का स्थल था वहां काउन्टर पर टोकन लेने की बजाय मैंने यूँ ही अपनी चप्पल उतारीं और मुख्य मंदिर में प्रवेश कर गया। उस समय दो चार लोग ही प्रतिमा के समक्ष विनत मुद्रा में खड़े थे। मैं भी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। प्रतिमा इतनी सुंदर थी कि मेरा मन वहां से हटने का करे ही नहीं। अचानक कोई मोटा-सा पंडित आया और उसने मुझे गर्दन से पकड़ कर ठेलते हुए बोला- छी-छी मुसलमान होकर तेरी हिम्मत कैसे पड़ी यहाँ घुसने की। यहाँ दूसरे धर्म के लोग नहीं आ सकते।

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मैं अचकचाया। मैं भला कब से मुसलमान हो गया! सबूत दिखाने के लिए मैंने आईकार्ड निकालने हेतु जेब में हाथ डाला कि देखो मैं तो हिंदू हूँ। पर जेब कहाँ! मैंने तो पैंट तो पहना ही नहीं था। चारखाने की लुंगी और मुड़ा-तुड़ा हरा कुरता पहन रखा था। ढाढ़ी भी थोड़ी बढ़ी हुई। एक पैसा भी नहीं। क्या सफाई दूं। मैं शर्मिंदा-सा बाहर निकल गया और लगभग भागते हुए गेस्ट हाउस पहुंचा। मगर अभी जब मैंने सुना और अखबारों में पढ़ा कि राहुल गाँधी ने द्वारिकाधीश मन्दिर में जाकर पूजा-अर्चना की तो मुझे लगा कि मैं द्वारिकाधीश मन्दिर जाकर उसी पुजारी से पूछूँ कि उसने यह कैसे तय कर लिया कि राहुल गाँधी हिंदू हैं। उनकी माँ एक ईसाई हैं वह भी विदेशी मूल की। पिता एक पारसी थे तब राहुल गाँधी हिंदू कैसे हो गए? उनकी बहन की शादी एक ईसाई युवक से हुई हैं। राहुल गाँधी कौन-से हिंदू देवी-देवता को मानते हैं जो उनके हिंदू होने की पुष्टि करे। और अगर हिंदू नहीं हैं तो उन्हें उस मन्दिर में प्रवेश कैसे मिला जिसमें सिर्फ हिंदू ही जा सकते हैं।

अपने ही धर्म के लोगों को ही पूजा या उपासना स्थल में प्रवेश की अनुमति देना कोई नई बात नहीं। हर मज़हब के लोग यही करते हैं। व्यक्ति चाहे जितना उदार, सेकुलर क्यों न हो लेकिन वह काबा में तब तक प्रवेश नहीं कर सकता जब तक कि वह इस्लाम का अनुयायी न हो। वेटिकन सिटी के चर्च में यही अनिवार्यता है। अगर यह नियम है तो हिंदू धर्म के शंकराचार्यों को द्वारिकाधीश मन्दिर के पुजारी से पूछना चाहिए कि उसने राहुल गाँधी को प्रतिमा पूजन की अनुमति कैसे दी! राहुल गाँधी कांग्रेस के सर्वोच्च नेता हैं, उन्हें कहीं भी जाकर अपनी पार्टी का प्रचार करने और मौजूदा सरकार की आलोचना करने का अधिकार है लेकिन उन्हें किसी धर्म की मान्यताओं को तोड़ने और उसके नियम भंग करने का अधिकार तो नहीं है। जो हिंदू राहुल गाँधी की इस पूजा-अर्चना से खुश हैं उन्हें सोचना चाहिए कि कांग्रेस को अगर अपने किसी नेता को हिंदुओं के इस आस्था स्थल पर भेजना ही था तो उसने अपने गैर हिंदू नेता का चयन कैसे किया। सत्य तो यह है कि इस तरह से राहुल गाँधी ने हिंदुओं की चार सर्वोच्च पीठों में से एक का अपमान किया है।

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हर धर्म अपने अनुयायियों के लिए कुछ नियम-क़ानून बनता है। इसमें कोई भेदभाव या निष्ठुरता नहीं है बल्कि अपने धर्म को मानने वालों की निष्ठा और उनकी आस्था को बनाए रखने का भाव है। क्योंकि कोई विधर्मी अगर किसी अन्य धर्म या मज़हब के आस्था केन्द्रों में जाता है तो उसका उद्देश्य छिद्रान्वेषण होता है। यह गलत है क्योंकि जब तक आप उस धर्म को धारण नहीं करते आपके अंदर न तो वह भक्तिभाव आएगा न ही समर्पण जो धर्म के लिए आवश्यक होता है। इसलिए राहुल गाँधी का यह कदम एक दिखावा था। किन्तु अहम बात तो यह है कि ऐसे चिंतनीय विषयों पर धर्म के लोगों को एक राय रखनी चाहिए। अगर पुजारियों को राहुल गाँधी का मन्दिर आना और पूजा करने में कोई आपत्ति नहीं दिखी तो तब उन्होंने क्यों आपत्ति जताई थी जब आज से साढ़े छह साल पहले मैं लुंगी पहन कर मन्दिर गया था।

अभी पिछले दिनों मुझे अपने ही परिवार के एक अनुष्ठान में शरीक होने से इसलिए रोक दिया गया क्योंकि मैंने जनेऊ नहीं धारण कर रखा था। मैं वापस लौट आया, हालाँकि परिवार का यह फरमान मुझे निरंकुश लगा। क्योंकि धर्म एक बड़ा दायरा है और जनेऊ धारण करना उसे संकुचित करता है। लेकिन मुझे लगा कि विरोध से उलटे परिवार में और खीझ पैदा होगी लेकिन धीरे-धीरे उनमें खुद यह भाव पैदा होगा कि जनेऊ धारण करना या न करना वृहत हिंदू समाज की अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। और इसका अकेला हल यही है कि या तो जनेऊ धारण करना समस्त हिंदू समाज के लिए अनिवार्य किया जाए अथवा इसका उन्मूलन कर दिया जाए। धर्म अपने अनुयायियों के लिए समान होता है इसलिए उसका कोई भी उपादान सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित नहीं किया जा सकता।

लेकिन धर्म दूसरे धर्म के अनुयायियों को अगर अपने उपासना स्थल में आने से रोकता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं। धर्म चूँकि एक समाज का निर्माण करता है और समाज अपने नीति-निर्धारक नियमों का नियमन करता है। इसलिए हर धर्म को यह अधिकार है कि अपने उपासना स्थल में आने वालों को वह उनके धर्म व मज़हब के अनुसार प्रतिबंधित करे। हालाँकि यहाँ बता दूं कि पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में पुजारियों ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी को प्रवेश से रोक दिया था। उनका मानना था कि इंदिरा गाँधी विवाह के बाद से हिंदू नहीं रहीं क्योंकि उन्होंने एक पारसी से शादी कर ली थी। इसी तरह काठमांडो के पशुपतिनाथ मन्दिर में भी उन्हें प्रवेश नहीं मिला था। लेकिन द्वारिका पीठ ने राहुल गाँधी को मन्दिर में प्रवेश दिया जबकि न तो वे जन्म से हिंदू हैं न ही हिंदू मान्यताओं में उनका भरोसा है।



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